-1320 MW बिजली खरीद का पूरा मामला गोलमाल, सरकार सार्वजनिक करे टेंडर की शर्तों में किए गए बदलाव और पूरी प्रक्रिया का ब्यौरा : यशपाल आर्य
– तेलंगाना-कर्नाटक में अदाणी समूह के साथ करार और उत्तराखण्ड में विरोध क्यों : भट्ट
पहाड़ का सच देहरादून। अडानी थर्मल पावर से 1320 मेगावाट बिजली खरीद के फैसले पर कांग्रेस और भाजपा के बीच तलवारें खिंच गईं हैं।

नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार को प्रदेश की जनता के सामने यह जवाब देना होगा कि 1320 MW कोयला आधारित बिजली की 25 वर्ष की खरीद के मामले में टेंडर की शर्तों में इतने बड़े बदलाव क्यों किए गए और इन बदलावों से किसे लाभ मिला? उन्होंने कहा कि सरकारी और नियामकीय दस्तावेज बताते हैं कि उत्तराखंड ने 1320 MW RTC कोयला आधारित बिजली की दीर्घकालीन खरीद के लिए प्रक्रिया शुरू की।
UERC के समक्ष UPCL ने स्वयं बताया कि राज्य की बढ़ती बिजली आवश्यकता को देखते हुए 1320 MW की नई व्यवस्था की जा रही है और इसके लिए Tariff Based Competitive Bidding का रास्ता अपनाया गया लेकिन अब इस पूरी प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पहला सवाल – टेंडर की शर्तों में इतने बड़े बदलाव क्यों?यदि मूल टेंडर में 86 शर्तें थीं और उनमें से 84 शर्तों में बदलाव किया गया, तो सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए कि मूल 86 शर्तें क्या थीं? किन 84 शर्तों में संशोधन किया गया? संशोधन का प्रस्ताव किसने दिया? उन्होंने कहा कि UPCL ने यह बदलाव क्यों मांगे? किन अधिकारियों ने इन्हें मंजूरी दी? क्या सभी संभावित बोलीदाताओं को समान अवसर मिला? आर्य ने कहा कि जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि टेंडर की शर्तें बदली गईं या किसी विशेष परिस्थिति कंपनी के अनुकूल बनाई गईं।
दूसरा सवाल – बिजली संयंत्र उत्तराखंड में क्यों नहीं? प्रश्न यह भी है कि उत्तराखंड की बिजली आवश्यकता के लिए प्रस्तावित 1320 MWपरियोजना का उत्पादन केंद्र राज्य से बाहर क्यों रखा गया? सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार उत्तराखंड के लिए छत्तीसगढ़ में आवंटित कोयला ब्लॉक का उपयोग करते हुए 1320 MW क्षमता का पावर प्लांट स्थापित किए जाने की व्यवस्था है तो सरकार बताए कि उत्तराखंड की जमीन, उत्तराखंड की जनता और उत्तराखंड के उपभोक्ताओं के हित में बनने वाली ऊर्जा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा उत्तराखंड से बाहर क्यों? .तीसरा सवाल – परिवहन और शिफ्टिंग का बोझ किस पर? यदि परियोजना राज्य से बाहर स्थापित होती है तो कोयला, बिजली और उससे जुड़ी लॉजिस्टिक्स की लागत का अंतिम भार किस पर पड़ेगा?
उन्होंने कहा कि सरकार को पूरा Cost-Breakup सार्वजनिक करना चाहिए। उत्तराखंड की जनता को बिजली की कीमत सिर्फ यूनिट रेट में नहीं, बल्कि पूरी परियोजना की वास्तविक लागत में जानने का अधिकार है।
चौथा सवाल ,25 साल का करार किसके हित में? हालिया कैबिनेट निर्णय के अनुसार उत्तराखंड सरकार ने Adani Power से 1320 MW कोयला आधारित बिजली खरीद के लिए 25 वर्ष के Power purchase agreement को मंजूरी दी है। रिपोर्टों के अनुसार स्वीकृत दर ₹5.746 प्रति यूनिट है।
आर्य ने कहा कि 25 वर्षों की अवधि में 1320 MW की पूरी क्षमता पर गणना करें तो यह व्यवस्था लगभग ₹1.66 लाख करोड़ के स्तर की संभावित खरीद राशि बैठती है। इतनी बड़ी सार्वजनिक वित्तीय प्रतिबद्धता पर सरकार को जवाब देना चाहिए। क्या यह दर सबसे पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया से तय हुई?
पांचवां सवाल – ‘गौतम शरणम् गच्छामि’ क्यों?
जब सरकारी दस्तावेजों के अनुसार Adani Power को 1320 MW का सफल Lowest bidder बताया गया है और कैबिनेट ने 25 वर्ष की खरीद को मंजूरी दी है, तो विपक्ष का सवाल उठाना स्वाभाविक है कि पूरी निविदा प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि हमारा सवाल किसी एक उद्योग समूह से नहीं, बल्कि सरकार की जवाबदेही और सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल से है। अगर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है तो सरकार-
मूल टेंडर सार्वजनिक करे।
बदली गई सभी 84 शर्तें सार्वजनिक करे।
UPCL की संबंधित चिट्ठियां सार्वजनिक करे।
सभी bidder और उनकी financial/technical bid सार्वजनिक करे। Evaluation report सार्वजनिक करे।
Cabinet Approval और PPA की पूरी शर्तें सार्वजनिक करे और बताए कि उत्तराखंड के उपभोक्ताओं पर अगले 25 वर्षों में कुल वित्तीय बोझ कितना पड़ेगा।
आर्य ने कहा कि 86 में से 84 शर्तों में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?इन बदलावों का प्रस्ताव किस अधिकारी संस्था ने दिया? क्या बदलाव किसी संभावित bidder की पात्रता अथवा सुविधा को प्रभावित करते थे? उत्तराखंड की बिजली आवश्यकता के लिए परियोजना छत्तीसगढ़ में लगाने का निर्णय क्यों?
बिजली की अंतिम लागत में कोयला, परिवहन, transmission और अन्य charges कितने होंगे.₹5.746 प्रति यूनिट की दर का comparative bidding data सरकार कब सार्वजनिक करेगी?
25 वर्ष के PPA की प्रत्येक प्रमुख शर्त जनता के सामने क्यों नहीं रखी जा रही? उत्तराखंड के उपभोक्ताओं को इस समझौते से वास्तविक आर्थिक लाभ क्या मिलेगा? नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उत्तराखंड कोई निजी कंपनी की संपत्ति नहीं है। उत्तराखंड की बिजली, उत्तराखंड के संसाधन और उत्तराखंड की जनता का पैसा इन तीनों पर पहला अधिकार उत्तराखंड की जनता का है। सरकार को सवालों से बचने के बजाय दस्तावेजों के साथ जवाब देना चाहिए।
आर्य ने कहा कि कांग्रेस की मांग है कि 1320 MW बिजली खरीद की पूरी निविदा प्रक्रिया, सभी संशोधित शर्तें, bidders की bids, evaluation report और 25 वर्षीय PPA सार्वजनिक किया जाए तथा इस पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए। पैसा जनता का है तो हिसाब भी जनता को चाहिए।

भाजपा ने भी दागा सवाल, तेलंगाना-कर्नाटक में अदाणी समूह के साथ करार और उत्तराखण्ड में विरोध क्यों : भट्ट
1320 मेगावाट थर्मल पावर से मजबूत होगी उत्तराखण्ड की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा द्वारा उत्तराखण्ड के 1320 मेगावाट थर्मल पावर करार पर उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस को ऊर्जा क्षेत्र पर सवाल उठाने से पहले अपने शासनकाल के फैसलों का हिसाब देना चाहिए।
भट्ट ने कहा कि कांग्रेस शासन में वर्ष 2016 में किए गए गैस पावर करार के कारण वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य को गैस आधारित बिजली के लिए 31.71 रुपये प्रति यूनिट तक भुगतान करना पड़ा। इसके विपरीत वर्तमान सरकार ने 1320 मेगावाट कोयला आधारित बिजली की दीर्घकालिक व्यवस्था लगभग 5.74 रुपये प्रति यूनिट की दर से 25 वर्षों के लिए सुनिश्चित की है। उन्होंने कहा कि दोनों दरों की तुलना स्वयं बताती है कि वर्तमान सरकार राज्य की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं के हितों को लेकर किस दिशा में काम कर रही है।
उन्होंने कांग्रेस के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ओर कांग्रेस उत्तराखण्ड में अदाणी समूह से जुड़े पावर करार पर सवाल उठा रही है, वहीं कांग्रेस शासित राज्यों में उसी समूह के साथ विभिन्न क्षेत्रों में निवेश और ऊर्जा परियोजनाओं को लेकर करार किए गए हैं। ऐसे में उत्तराखण्ड में इसी विषय को लेकर विरोध का आधार कांग्रेस को स्पष्ट करना चाहिए।
राज्य पर जमीन और प्रदूषण का बोझ नहीं
भट्ट ने कहा कि 1320 मेगावाट की यह परियोजना उत्तराखण्ड में स्थापित नहीं हो रही है। राज्य को इसके लिए न अपनी जमीन देनी है और न ही यहां परियोजना से जुड़ा प्रदूषण भार आएगा। राज्य का उद्देश्य भविष्य की बढ़ती बिजली मांग के लिए दीर्घकालिक और स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की ऊर्जा जरूरत आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ने वाली है। ऐसे में 25 वर्षों के लिए बिजली की दीर्घकालिक व्यवस्था राज्य की ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मानसून और आपदा के समय थर्मल पावर बनेगी सहारा
भट्ट ने कहा कि उत्तराखण्ड की बिजली व्यवस्था में जल विद्युत का महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन मौसम और प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण उत्पादन में उतार-चढ़ाव संभव है। सौर ऊर्जा भी मौसम पर निर्भर है। ऐसे में बेस-लोड के रूप में थर्मल पावर राज्य की बिजली आपूर्ति को स्थिरता देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
कांग्रेस अपने शासनकाल की बिजली कटौती भी याद करे
भट्ट ने कहा कि कांग्रेस को अपने शासनकाल की बिजली आपूर्ति की स्थिति भी याद करनी चाहिए। वर्तमान सरकार का प्रयास है कि प्रदेश में निर्बाध बिजली आपूर्ति के साथ भविष्य की मांग के अनुरूप अभी से ऊर्जा संसाधन सुनिश्चित किए जाएं।
उन्होंने कहा कि सरकार केवल एक स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय हाइड्रो, सोलर, स्मॉल हाइड्रो, पंप स्टोरेज और थर्मल सहित विभिन्न ऊर्जा स्रोतों पर काम कर रही है।
ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की दिशा में बड़े कदम
भट्ट ने कहा कि प्रदेश में लंबे समय से लंबित जल विद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के साथ सौर एवं लघु जल विद्युत क्षेत्र में भी काम किया जा रहा है। लखवाड़, किसाऊ, त्यूणी-प्लासू और भ्योल-रूपसियाबगड़ जैसी परियोजनाएं राज्य की भविष्य की ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य उत्तराखण्ड को ऐसा ऊर्जा सक्षम राज्य बनाना है जो अपनी बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के साथ ऊर्जा क्षेत्र को राजस्व, स्थानीय विकास और रोजगार के अवसरों से भी जोड़ सके।
कांग्रेस आरोप नहीं, अपने करारों का हिसाब दे : भट्ट
भट्ट ने कहा कि कांग्रेस को तथ्यहीन आरोप लगाने के बजाय यह बताना चाहिए कि उसके शासनकाल में महंगी गैस आधारित बिजली के करार किन परिस्थितियों में किए गए और आज उन्हीं फैसलों का आर्थिक भार राज्य को क्यों उठाना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड सरकार द्वारा 1320 मेगावाट बिजली की दीर्घकालिक व्यवस्था राज्य की भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखकर की गई है। कांग्रेस को यदि इस पर आपत्ति है तो उसे राजनीतिक आरोपों के बजाय तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए।

