
पहाड़ का सच
9 अगस्त का दिन भारतीय और विश्व इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। इसी दिन 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (अगस्त क्रांति) की शुरुआत हुई थी, 1925 को इसी दिन काकोरी कांड हुआ था, और 1945 में जापान के नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था।
मुख्य ऐतिहासिक घटनाएं 1925: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारियों ने लखनऊ के पास काकोरी रेलवे स्टेशन पर सरकारी खजाने को लूटा था, जिसे ‘काकोरी कांड’ कहा जाता है।
Gg . 1942: महात्मा गांधी के आह्वान पर मुंबई में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (अगस्त क्रांति) की औपचारिक शुरुआत हुई और गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा दिया।

1945: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के नागासाकी शहर पर ‘फैट मैन’ नामक दूसरा परमाणु बम गिराया, जिससे भारी तबाही हुई.।
1965: सिंगापुर मलेशिया से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बना. विश्व आदिवासीt दिवस: हर साल 9 अगस्त को पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है।
8 अगस्त की रात: “करो या मरो” का मंत्र: अगस्त 1942 को बॉम्बे (अब मुंबई) के ग्वालिया टैंक मैदान (जिसे अब अगस्त क्रांति मैदान कहते हैं) में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का ऐतिहासिक अधिवेशन हुआ.वहां गांधीजी ने देश को संबोधित करते हुए एक जादुई मंत्र ki दिया: “करो या मरो” (Do or Die).उन्होंने साफ कहा, “हम या तो भारत को स्वतंत्र कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे। गांधी के इस भाषण ने आधी रात को ही देश के करोड़ों लोगों के भीतर देशभक्ति की एक ऐसी आग सुलगा दी, जो ब्रिटिश दमन से भी नहीं बुझी।

9 अगस्त की सुबह: ‘ऑपरेशन थंडरबोल्ट’ और पहली चिंगारी : अंग्रेजी हुकूमत गांधी के इस रुख से घबरा गई थी। उन्होंने आंदोलन को कुचलने के लिए 9 अगस्त की सुबह तड़के ‘ऑपरेशन थंडरबोल्ट’ चलाया.नेताओं की गिरफ्तारी की गई।
सूरज उगने से पहले ही महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद समेत कांग्रेस के तमाम शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थानों (जैसे आगा खान पैलेस और अहमदनगर किला) में बंद कर दिया गया।
अरुणा आसफ अली का साहस: अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व विहीन होकर आंदोलन दम तोड़ देगा, लेकिन तभी इतिहास की सबसे साहसी घटना घटी। 33 वर्ष की युवा महिला अरुणा आसफ अली ने पुलिस की बंदूकों और लाठियों के बीच ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराकर आंदोलन की शुरुआत का बिगुल फूंक दिया. वह रातों-रात इस क्रांति की ‘झांसी की रानी’ बन गईं।
जब आम जनता खुद नेता बन गई: शीर्ष नेताओं के जेल जाने के बाद भारत की आम जनता खुद अपनी नेता बन गई। यह आंदोलन देश के कोने-कोने में फैल गया:छात्रों और युवाओं का उग्र रूप: कॉलेज छोड़ने वाले हजारों छात्रों ने ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकों को निशाना बनाया. डाकघरों, रेलवे स्टेशनों, और पुलिस थानों पर तिरंगे लहराए गए. टेलीफोन और टेलीग्राम की तारें काट दी गईं ताकि अंग्रेजों का संपर्क टूट जाए।
समानांतर सरकारों की स्थापना: देश के कुछ हिस्से पूरी तरह से ब्रिटिश नियंत्रण से मुक्त हो गए। बलिया (यूपी) में चित्तू पांडे के नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने जेल के ताले तोड़कर नेताओं को छुड़ा लिया और अपनी स्वतंत्र सरकार घोषित कर दी। सतारा (महाराष्ट्र) में नाना पाटिल ने ‘प्रति सरकार’ बनाई, जिसने महीनों तक क्षेत्र का प्रशासन चलाया।
तामलुक (बंगाल): यहां मातंगिनी हाजरा जैसी 73 वर्षीय बुजुर्ग महिला ने सीने पर गोलियां खाकर भी तिरंगे को झुकने नहीं दिया और वहां ‘ताम्रलिप्त जातीय सरकार’ का गठन हुआ।
अंडरग्राउंड (भूमिगत) रेडियो स्टेशन: जब अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गई, तब उषा मेहता ने गुप्त रूप से ‘कांग्रेस रेडियो’ की शुरुआत की। इसके जरिए डॉ. राममनोहर लोहिया और अच्युत पटवर्धन जैसे नेता अंडरग्राउंड रहकर पूरे देश में क्रांति के संदेश और रणनीतियां पहुंचाते थे। ब्रिटिश दमन और आंदोलन का परिणाम ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। भीड़ पर मशीनगनों से गोलियां चलाई गईं और गांवों पर हवाई जहाजों से बम गिराए गए। करीब 1 लाख से अधिक लोगों को जेल में डाल दिया गया और हजारों लोग शहीद हुए।
इस क्रांति का वास्तविक महत्व: हालांकि, इस आंदोलन को सैन्य बल से कुछ समय के लिए दबा दिया गया, लेकिन इसने अंग्रेजों को यह बात पूरी तरह समझा दी कि अब भारतीय जनता पर लाठी और बंदूक के दम पर शासन करना असंभव है. इस क्रांति ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया, जो इसके ठीक 5 साल बाद 15 अगस्त 1947 को सच हुआ.

