– सहयोगी के घर ईडी की छापेमारी के बाद उपजे नए हालात
– चुनावी साल में भाजपा को मिला पॉलिटिकल जैकपॉट,कांग्रेस पर हमले होंगे तेज
– कांग्रेस में रावत विरोधी खेमा कर सकता है अंदरूनी मार, युवाओं की लड़ाई की कुंद पड़ सकती है धार
हरीश जोशी/पहाड़ का सच देहरादून।
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री व वरिष्ठ कांग्रेस नेता हरीश रावत के मौजूदा निजी सहायक व पूर्व ओएसडी के घर पर ईडी के छापे और उसके बाद हरीश रावत का कांग्रेस के सभी संगठनात्मक पदों से इस्तीफा, चुनावी साल में राज्य की राजनीति का एक ऐसा बहुत बड़ा घटनाक्रम है जिसका कांग्रेस पर असर पड़ सकता है। .ईडी ने यह कार्रवाई साल 2016 के UKSSSC भर्ती घोटाले (VPDO परीक्षा) से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में की है, जिसमें जीना के ठिकाने से ₹32 लाख कैश, सोने के सिक्के-चेन और 12 लग्जरी घड़ियां बरामद हुई हैं। इसके तुरंत बाद हरीश रावत ने उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी और राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के स्थायी आमंत्रित सदस्य के पद से इस्तीफा दे दिया।
हरीश रावत ने खुद अपने बयान में स्पष्ट किया कि वह नहीं चाहते कि उनकी वजह से आगामी विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार के खिलाफ कांग्रेस का संघर्ष कमजोर पड़े। राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी युवाओं के रोजगार और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर आक्रामक हैं। उत्तराखंड में भर्ती घोटाला एक बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में हरीश रावत जानते थे कि यदि वह पदों पर बने रहते, तो भाजपा पूरी कांग्रेस पार्टी को कटघरे में खड़ा कर देती।
इस्तीफा देकर उन्होंने पार्टी के भ्रष्टाचार विरोधी नैरेटिव को ‘डैमेज कंट्रोल’ देने की कोशिश की है। इस्तीफा देकर हरीश रावत ने खुद को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है जो शुचिता और नैतिकता की राजनीति करता है। उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया कि भले ही आरोप उनके सहयोगी पर लगे हों, लेकिन वह किसी पद का मोह नहीं रखते। यह कदम उठाकर उन्होंने जनता के बीच अपनी छवि को एक पीड़ित और साथ ही एक जिम्मेदार वरिष्ठ नेता के रूप में स्थापित करने का दांव खेला है।
हरीश रावत ने इस कार्रवाई को सीधे आगामी चुनावों से जोड़ दिया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जब भी चुनाव पास आते हैं, एजेंसियां दस्तक देने लगती हैं, लेकिन इस बार मेरे घर के बजाय मेरे सहयोगी के घर पर दस्तक देकर एक खास नैरेटिव बनाने की कोशिश की गई है। रावत का यह बयान साफ करता है कि वह इस छापेमारी को भाजपा की ‘राजनीतिक बदले की भावना’ (Political Vendetta) के रूप में भुनाने और जनता से सहानुभूति बटोरने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
उत्तराखंड कांग्रेस लंबे समय से गुटबाजी से जूझती रही है। हरीश रावत भले ही अब चुनावी राजनीति से थोड़ा पीछे रहने की बात करते हों, लेकिन पार्टी के भीतर उनका दबदबा हमेशा रहा है। संगठनात्मक पदों से उनके हटने के बाद कांग्रेस के भीतर उनके विरोधी गुट को हरीश रावत को हाशिए पर धकेलने का एक बड़ा हथियार मिल जाएगा। टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीति तक, अब रावत गुट का प्रभाव पहले की तुलना में कुछ कमजोर हो सकता है।चुनावी साल में भाजपा के लिए यह मुद्दा एक ‘पॉलिटिकल जैकपॉट’ की तरह है। भाजपा अब युवाओं के बीच यह नैरेटिव मजबूती से ले जाएगी कि कांग्रेस के शासनकाल (2014-2017) में युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया और ओएमआर शीट में हेरफेर कर नौकरियां बेची गईं।
भाजपा इस छापेमारी का इस्तेमाल कांग्रेस को बैकफुट पर धकेलने और उसके युवा न्याय व बेरोजगारी के दावों को खोखला साबित करने के लिए करेगी। उत्तराखंड में भर्ती परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक हमेशा से युवाओं के लिए सबसे बड़ा और भावुक मुद्दा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार पहले ही सख्त नकल विरोधी कानून का श्रेय लेती आई है। अब पूर्व मुख्यमंत्री के सबसे करीबी सहयोगी के घर से बड़ी मात्रा में नकदी और विलासिता का सामान मिलना आम जनता और खासकर बेरोजगार युवाओं के बीच कांग्रेस की छवि पर नकारात्मक असर डाल सकता है, जिसका सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिल सकता है।
हरीश रावत का इस्तीफा उनकी रणनीतिक कला का हिस्सा है, ताकि पार्टी पर आंच न आए और वह खुद भी कानूनी व राजनीतिक चक्रव्यूह से बाहर निकल सकें। हालांकि, चुनावी साल में इस बड़ी कार्रवाई ने कांग्रेस की राह को कठिन कर दिया है और आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में इस मुद्दे पर वार-पलटवार और तेज होने वाला है।

