प्रकृति के चितेरे कवि की जयंती पर विशेष: जब-जब हिमालय पर बर्फ चमकेगी और वादियों में बुरांस खिलेगा, तब-तब उनकी कविताएं जीवंत उठेंगी
हरीश जोशी/पहाड़ का सच। साहित्य जगत में कुछ ऐसे नक्षत्र हुए हैं जो बहुत कम समय के लिए चमके, लेकिन अपनी आभा से पूरे साहित्याकाश को हमेशा के लिए आलोकित कर गए। ऐसे ही एक कालजयी रचनाकार थे हिमवंत कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल।
20 अगस्त 1919 को उत्तराखंड की पावन भूमि पर जन्मे बर्त्वाल को समीक्षक ‘हिंदी का कालिदास’ और ‘हिंदी साहित्य का कीट्स’ कहकर पुकारते हैं. मात्र 28 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जो साहित्य रचा, वह उन्हें अमर बनाने के लिए पर्याप्त है। चंद्र कुंवर बर्त्वाल का जन्म उत्तराखंड के तत्कालीन चमोली (वर्तमान में रुद्रप्रयाग) जिले के मालकोटी गांव (पट्टी तल्ला नागपुर) में हुआ था।
उनके पिता भूपाल सिंह बर्त्वाल एक निष्ठावान अध्यापक थे। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे और उनका वास्तविक नाम ‘कुंवर सिंह बर्त्वाल’ था। उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा गांव के ही विद्यालय से प्राप्त की। उन्होंने 1935 में पौड़ी इंटर कॉलेज से हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की इसके बाद उन्होंने देहरादून और इलाहाबाद (प्रयागराज) से अपनी आगे की पढ़ाई की।
1939 में इलाहाबाद से बी.ए. करने के बाद उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.ए. (इतिहास) में दाखिला लिया। यहीं पर वे हिंदी साहित्य के महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के संपर्क में आए, जिसने उनकी काव्य चेतना को एक नई धार दी
प्रकृति प्रेमी और हिमालय के गायक सुमित्रानंदन पंत की तरह चंद्र कुंवर बर्त्वाल की कविताओं का मुख्य आधार भी प्रकृति ही थी लेकिन पंत और बर्त्वाल में यह अंतर था कि चंद्र कुंवर ने हिमालय को दूर से नहीं देखा, बल्कि उसे जिया था।
वे स्वयं कहते थे”मेरे काव्य का नायक हिमालय है”। उनकी कविताओं में उत्तराखंड के पहाड़, नदियां, झरने, बुरांस के लाल फूल, मखमली बुग्याल और स्थानीय पक्षियों (जैसे कफ्फू, हिलांस और घुघूती) का सजीव चित्रण मिलता है। ऋषिपर्णा (वर्तमान रिस्पना नदी) पर लिखी उनकी पंक्तियां आज भी बहुत प्रसिद्ध हैं. “हे साल मेखले किस गिरी से तुम इतना रूप लिए निखरे,नयनों में आधा सुधा भरे, ऋषि पर्णा की दुफेरी।
1941 में एम.ए. की पढ़ाई के दौरान ही बर्त्वाल उस समय के असाध्य रोग क्षय रोग की चपेट में आ गए। स्वास्थ्य खराब होने के कारण उन्हें वापस पहाड़ लौटना पड़ा। उनके पिता ने उनके लिए अगस्तमुनि के पास ‘पंवालिया’ के जंगलों में एक एकांत घर बना दिया। बर्त्वाल वहां बिल्कुल अकेले रहते थे। मौत को अपने बेहद करीब देखते हुए भी उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा।
हिंदी साहित्य में वे पहले ऐसे कवि माने जाते हैं जिन्होंने ‘मृत्यु’ को एक डरावने सच के रूप में नहीं, बल्कि बेहद आत्मीयता और विस्तार के साथ अपनी कविताओं में उतारा। मात्र 28 वर्ष के छोटे से जीवनकाल में उन्होंने हिंदी साहित्य को लगभग 1,000 कविताएं, 24 कहानियां, एकांकी और बाल साहित्य का समृद्ध खजाना सौंपा. उनके जाने के बाद उनके अभिन्न मित्र शंभू प्रसाद बहुगुणा ने उनकी रचनाओं को संकलित कर प्रकाशित करवाया।
उनके प्रमुख काव्यों में नंदिनी (1946), विराट हृदय (1950), पयस्विनी (1951), गीत माधवी, प्रणयिनी, और कंकड़-पत्थर. प्रसिद्ध कविताएं: काफल पाकू, जीतू, मेघ नंदिनी, अकेला कमरा, मरण, निराला के प्रति, और हिम स्तवक.उनकी कविताओं में छायावाद के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक छुआछूत और सांप्रदायिकता के खिलाफ प्रगतिशील स्वर भी देखने को मिलते हैं।
14 सितंबर 1947 को देश की आजादी के ठीक एक महीने बाद, प्रकृति का यह महान चितेरा और हिमवंत पुत्र मात्र 28 वर्ष की उम्र में इस नश्वर संसार को अलविदा कह गया। आज चंद्र कुंवर बर्त्वाल की जयंती पर उत्तराखंड सहित पूरे देश में उन्हें याद किया जाता है। उनकी कविताओं को प्राथमिक शिक्षा के पाठ्यक्रमों में भी शामिल किया गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके साहित्यिक योगदान और पर्यावरण के प्रति उनके प्रेम को समझ सकें।
उनके कार्यस्थल पंवालिया को एक संग्रहालय के रूप में विकसित करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं.बर्त्वाल भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन जब-जब हिमालय पर बर्फ चमकेगी और वादियों में बुरांस खिलेगा, तब-तब उनकी कविताएं जीवंत उठेंगी।