
कोर्ट ने कहा राज्य सरकार आवश्यक कार्रवाई कर चुकी और जांच जारी है
तीन इंजीनियर और ठेकेदार पहले ही निलंबित, पीडब्ल्यूडी की प्रारंभिक जांच जारी
पहाड़ का सच नैनीताल/देहरादून। 16 करोड़ की लागत से बने नंदा की चौकी पुल के मामले में हाईकोर्ट ने दायर याचिका को निरस्त करते हुई हुए हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच की मांग को भी खारिज कर दिया।

नंदा की चौकी पुल के एक हिस्से के जनता के लिए खोले जाने के कुछ समय बाद ढहने के मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने स्वतंत्र उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग को फिलहाल स्वीकार नहीं किया है।

दायर याचिका पर सोमवार को हुई सुनवाई के बाद जारी फैसले में मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि राज्य सरकार मामले में पहले ही जांच शुरू कर चुकी है और कार्रवाई भी की गई है। ऐसे में इस स्तर पर किसी और आदेश की जरूरत नहीं है। और न ही उच्चस्तरीय जांच की।
अदालत ने जांच के अंतिम नतीजे की प्रतीक्षा करने को कहा और जनहित याचिका को खारिज कर दिया। डॉ. बैजनाथ की ओर से दायर जनहित याचिका में नंदा की चौकी पुल के नियोजन, डिजाइन, निर्माण, पर्यवेक्षण, निरीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण, प्रमाणन और पुनर्निर्माण से संबंधित संपूर्ण रिकॉर्ड अदालत के समक्ष पेश करने की मांग की गई थी। याचिका में पुल के एक हिस्से के ढहने के कारणों की जांच के लिए स्वतंत्र उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने की भी मांग की गई थी।
ठेके के आवंटन पर उठाए गए थे सवाल
याचिका में आरोप लगाया गया था कि पुल निर्माण का ठेका पाने वाली फर्म का चयन अनुचित प्रभाव के आधार पर किया गया। याचिकाकर्ता ने कहा था कि फर्म की एक साझेदार रुचि भट्ट भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष हैं और उनके राजनीतिक प्रभाव के चलते ठेका दिया गया। याचिकाकर्ता ने यह आशंका भी जताई थी कि राज्य स्तर पर अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ प्रभावी जांच या कार्रवाई नहीं की जाएगी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि लोक निर्माण विभाग के क्षेत्रीय कार्यालय, देहरादून की ओर से सात अगस्त 2026 को जारी निर्देशों के आधार पर मुख्य अभियंता, जोनल कार्यालय, पीडब्ल्यूडी देहरादून के स्तर पर प्रारंभिक जांच चल रही है।
तीन इंजीनियर और ठेकेदार निलंबित
राज्य की ओर से अदालत को यह भी बताया गया कि मामले में तीन इंजीनियरों को पहले ही निलंबित किया जा चुका है। वहीं, प्रतिवादी संख्या-8 की ओर से पेश अधिवक्ता ने बताया कि संबंधित ठेकेदार को भी निलंबित किया गया है। अदालत को यह जानकारी भी दी गई कि अनुबंध में दोष दायित्व अवधि तीन वर्ष है और पुल में सामने आया दोष इस प्रावधान के अंतर्गत आता है।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि राज्य सरकार ने जांच शुरू कर दी है और पर्याप्त कार्रवाई भी की जा चुकी है। अदालत ने कहा कि फिलहाल किसी अतिरिक्त आदेश की आवश्यकता नहीं है और जांच के अंतिम परिणाम की प्रतीक्षा की जानी चाहिए।
इसके बाद खंडपीठ ने जनहित याचिका की कार्यवाही समाप्त कर दी। लंबित आवेदन, यदि कोई हो, उसका भी निस्तारण कर दिया गया।
उल्लेखनीय है कि अदालत के आदेश में ठेके के आवंटन और राजनीतिक प्रभाव से संबंधित आरोपों को याचिकाकर्ता के आरोप के रूप में दर्ज किया गया है; इन्हें अदालत द्वारा सिद्ध तथ्य नहीं माना गया है।
याचिकाकर्ता डॉ बैजनाथ की ओर से अधिवक्ता पुलक राज मलिक और साहिल मलिक उपस्थित हुए। उत्तराखंड राज्य की ओर से अपर महाधिवक्ता अमरेंद्र प्रताप सिंह, अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता बी.एस. परिहार तथा उप महाधिवक्ता राजीव सिंह बिष्ट उपस्थित हुए। केंद्र सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता पंकज चतुर्वेदी और आर्यन देव उनियाल उपस्थित हुए।
ये था मामला
साल 2025 की बरसात में नंदा चौकी पुल टूट गया था। लोक निर्माण विभाग ने 16 करोड़ की लागत से इस अहम पुल को तैयार किया था। 12 जुलाई 2026 को यह पुल यातायात के लिए खोला गया था। लेकिन 28 जुलाई की भारी बरसात में इस पुल की एप्रोच रोड धंस गयी थी। हालांकि, कई घण्टे की मरम्मत के बाद 28 जुलाई की रात को ही यातायात शुरू करवा दिया गया था। लेकिन इस मुद्दे पर विपक्ष ने भाजपा पर करारे हमले किये थे।

