
पहाड़ का सच देहरादून। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने विधानसभा में पेश ₹7,844 करोड़ के अनुपूरक बजट को जनहित से भटका हुआ और चुनावी साल में सरकारी प्रचार तथा मुख्यमंत्री की घोषणाओं को चमकाने वाला बजट करार दिया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड आपदा, पलायन, बेरोजगारी, बदहाल शिक्षा व्यवस्था और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन सरकार की चिंता जनता को राहत देने से ज्यादा अपनी छवि बनाने और चुनाव से पहले युवाओं को लुभाने की दिखाई देती है।
आर्य ने कहा कि जिस प्रदेश का युवा रोजगार मांग रहा है, किसान मुआवजे की बाट जोह रहा है और आपदा प्रभावित परिवार सरकारी सहायता के लिए भटक रहे हैं, वहां सरकार का विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये बहाना उसकी प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह अनुपूरक बजट जनता की तकलीफों का समाधान कम और सरकार की चुनावी जरूरतों का हिसाब ज्यादा नजर आता है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि सूचना विभाग को विज्ञापनों के लिए ₹125 करोड़ की अतिरिक्त धनराशि दी जा रही है। इससे विभाग का बजट ₹549.68 करोड़ से बढ़कर ₹675.13 करोड़ हो जाएगा। उनके अनुसार, धामी सरकार पिछले पांच वर्षों में विज्ञापनों पर ₹1100 करोड़ से अधिक खर्च कर चुकी है और अकेले वित्तीय वर्ष 2024-25 में ₹290 करोड़ खर्च किए गए। इसके अतिरिक्त मीडिया सलाहकार समिति के गठन के लिए ₹45 लाख का प्रावधान किया गया है।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर सरकार जनता के पैसे से अपनी उपलब्धियों का ढोल पीटने पर इतनी मेहरबान क्यों है? क्या उत्तराखंड में बेरोजगारी समाप्त हो गई है, क्या आपदा प्रभावितों को पूरा मुआवजा मिल गया है, क्या अस्पतालों और स्कूलों की हालत सुधर गई है, जो विज्ञापनों पर इतनी बड़ी रकम खर्च की जा रही है?
आर्य ने कहा कि सरकारी खजाना मुख्यमंत्री की छवि चमकाने का निजी प्रचार माध्यम नहीं है। जनता के टैक्स का पैसा जनता की सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं पर खर्च होना चाहिए, न कि चुनावी माहौल बनाने पर। यशपाल आर्य ने कहा कि माध्यमिक और उच्च शिक्षा में टैबलेट वितरण के लिए ₹200 करोड़ का प्रावधान किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि साढ़े चार साल तक युवाओं की समस्याओं की अनदेखी करने वाली सरकार अब चुनाव नजदीक आते ही जेन-जी को लुभाने की कोशिश कर रही है।
उन्होंने कहा कि भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों में अनिश्चितता के खिलाफ सड़कों पर उतरे नौजवानों ने सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। प्रदेश का युवा पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, समयबद्ध नियुक्तियां और स्थायी रोजगार मांग रहा है। उसे चुनाव से पहले टैबलेट बांटकर उसकी वास्तविक समस्याओं से ध्यान नहीं भटकाया जा सकता। युवाओं को डिजिटल उपकरणों के साथ रोजगार के अवसर, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और निष्पक्ष भर्ती व्यवस्था चाहिए। टैबलेट बांटना रोजगार देने का विकल्प नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि एक तरफ टैबलेट वितरण के लिए ₹200 करोड़ रखे जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इसी अनुपूरक बजट में राजकीय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए मात्र ₹5.76 लाख का प्रावधान किया गया है।
प्रदेश के अनेक विद्यालय प्रधानाचार्यों और शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में सरकार को बताना चाहिए कि उसकी प्राथमिकता विद्यालयों में शिक्षक उपलब्ध कराना है या चुनाव से पहले घोषणाओं के जरिए राजनीतिक लाभ लेना। मुख्यमंत्री की घोषणाओं के नाम पर ₹200 करोड़, लेकिन न जिले का पता, न काम का हिसाब!
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं के लिए ₹100 करोड़ का एकमुश्त अनुदान मांगा गया है, जबकि मूल बजट में पहले से ही ₹100 करोड़ का प्रावधान था। इस तरह सात महीनों में इस मद के लिए कुल ₹200 करोड़ का प्रावधान सामने आता है, लेकिन सरकार यह स्पष्ट नहीं कर रही कि धनराशि किस जिले, किस परियोजना और किस कार्य पर खर्च की जाएगी।
उन्होंने सवाल किया कि बिना कार्यवार और जिलावार विवरण के इतनी बड़ी धनराशि का प्रावधान आखिर किस उद्देश्य से किया जा रहा है? जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके पैसे का इस्तेमाल कहां और कैसे होगा।
श्री आर्य ने कहा कि ₹25 करोड़ आकस्मिकता निधि से पहले ही निकाले जा चुके हैं। सरकार लगभग ₹190 करोड़ आकस्मिकता निधि से पहले खर्च कर चुकी है और अब विधानसभा से मंजूरी मांग रही है। उन्होंने इसे वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और विधायी परंपराओं से जुड़ा गंभीर मामला बताते हुए कहा कि पहले खर्च करो और बाद में सदन से मंजूरी मांगोकृयह तरीका लोकतांत्रिक जवाबदेही की भावना के अनुरूप नहीं है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उत्तराखंड ओलावृष्टि, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक संकटों का सामना कर रहा है। किसान फसल बर्बाद होने से परेशान हैं, ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्तियों को नुकसान पहुंच रहा है और मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण परिवारों की आजीविका तथा सुरक्षा पर संकट बना हुआ है। इसके बावजूद मानसून के दौरान बाढ़ सुरक्षा के लिए केवल ₹10 करोड़, वनाग्नि की रोकथाम के लिए ₹7.07 करोड़ और मानव-वन्यजीव संघर्ष के लिए मात्र ₹3.20 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
उन्होंने कहा कि वन्यजीवों के हमलों में जान-माल गंवाने वाले प्रभावित परिवारों को कई मामलों में वर्षों से मुआवजे का इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पर्याप्त बजट उपलब्ध कराए और प्रभावितों को समय पर राहत दे। लेकिन यहां विज्ञापन के लिए ₹125 करोड़ अतिरिक्त रखे जा रहे हैं, जबकि लोगों की जान-माल की सुरक्षा के लिए बेहद सीमित धनराशि दिखाई दे रही है।
आर्य ने कहा कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं के लिए अकेले ₹100 करोड़ की अतिरिक्त राशि बाढ़ सुरक्षा, वनाग्नि रोकथाम, मानव-वन्यजीव संघर्ष, भोजन माताओं, विधवा पेंशन, किसान पेंशन और पुलों से संबंधित सात मदों के कुल ₹84.27 करोड़ से भी अधिक है।
उन्होंने सवाल किया कि क्या मुख्यमंत्री की घोषणाएं जनता की सुरक्षा, किसानों की आजीविका, जरूरतमंद महिलाओं की पेंशन और प्रदेश के बुनियादी ढांचे से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई हैं?
आर्य ने राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि से संबंधित व्यय में पर्यटन के नाम पर ₹75 करोड़ रखे जाने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार स्पष्ट करे कि इस धनराशि का वास्तविक उद्देश्य क्या है, किन परियोजनाओं पर इसे खर्च किया जाएगा और आपदा राहत के निर्धारित उद्देश्यों के साथ इसका क्या संबंध है।
उन्होंने पूछा कि जब प्रदेश के आपदा प्रभावित परिवार सहायता और पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तब आपदा से संबंधित धनराशि में पर्यटन के लिए ₹75 करोड़ का प्रावधान किस आधार पर किया गया है? सरकार को इस पर सदन में स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
नेता प्रतिपक्ष ने सरकार से मांग की है कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं के लिए निर्धारित ₹200 करोड़ की जिलेवार और कार्यवार सूची विधानसभा के पटल पर रखी जाए। पिछले पांच वर्षों में विज्ञापनों पर हुए खर्च का श्वेतपत्र जारी किया जाए, जिसमें प्रत्येक समाचार पत्र, टीवी चैनल, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अन्य माध्यम को दी गई धनराशि का विवरण हो।
पिछले पांच वर्षों में ई-लर्निंग पर हुए खर्च और उससे प्राप्त परिणामों का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक किया जाए। राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि से संबंधित व्यय में पर्यटन के लिए रखे गए ₹75 करोड़ के प्रावधान का उद्देश्य और परियोजनावार विवरण सदन में प्रस्तुत किया जाए। बाढ़ सुरक्षा, वनाग्नि रोकथाम और मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध कराया जाए तथा प्रभावित परिवारों को लंबित मुआवजा समय पर दिया जाए।
प्रचार-प्रसार पर होने वाले खर्च की समीक्षा कर आवश्यक धनराशि को आपदा प्रबंधन, शिक्षा, रोजगार और जनकल्याण की प्राथमिकताओं में लगाया जाए।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उत्तराखंड की जनता को अब विज्ञापनों में दिखाई जाने वाली उपलब्धियां नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाला काम चाहिए। सरकार को बताना होगा कि जब प्रदेश का युवा रोजगार के लिए संघर्ष कर रहा है, किसान नुकसान की भरपाई मांग रहा है, स्कूल शिक्षकविहीन हैं और आपदा प्रभावित परिवार राहत की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तब सरकारी खजाने का इतना बड़ा हिस्सा प्रचार पर क्यों खर्च किया जा रहा है।
श्री आर्य ने कहा कि जनता के पैसे का पहला अधिकार जनता की जरूरतों पर है, सरकार की छवि पर नहीं। अनुपूरक बजट में प्राथमिकताएं बदलनी होंगी प्रचार से पहले सुरक्षा, घोषणाओं से पहले काम और चुनावी प्रलोभनों से पहले रोजगार व जनकल्याण सुनिश्चित करना होगा।


