त्वरित टिप्पणी पहाड़ का सच देहरादून।गैरसैंण केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन की भावनाओं का केंद्र बिंदु है। हर बार करोड़ों रुपये खर्च करके पूरे सरकारी तामझाम (विधायक, अधिकारी, कर्मचारी और सुरक्षा बल) को देहरादून से पहाड़ पर ले जाना और फिर महज़ कुछ घंटों में सत्र समेटकर लौट आना, जनता की गाढ़ी कमाई और टैक्स के पैसों को लेकर सवाल खड़े होना लाजिमी है।
विश्लेषकों और आम जनता का मानना है कि पर्वतीय क्षेत्र की बुनियादी समस्याओं जैसे पलायन, स्वास्थ्य , शिक्षा और रोजगार पर गंभीर और लंबी बहस होनी चाहिए थी। जब सत्र डेढ़-दो दिन में ही खत्म हो जाते हैं, तो जनता के वास्तविक सवाल भराड़ीसैंण की पहाड़ियों की धुंध में गायब हो जाते हैं। लोकतंत्र में सदन की लंबी अवधि और सार्थक चर्चा ही जनता के प्रति सरकार की जवाबदेही तय करती है। .इस सत्र के दौरान केवल सदन के भीतर ही नहीं, बल्कि बाहर गैरसैंण (जंगलचट्टी) की सड़कों पर भी भारी जनाक्रोश देखने को मिला।
उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) और अन्य जन-संगठनों ने गैरसैंण को ‘स्थायी राजधानी’ घोषित करने और ‘मूल निवास व भू-कानून’ की मांगों को लेकर विधानसभा घेराव का प्रयास किया। चुनाव नजदीक होने के कारण क्षेत्रीय पहचान के इन मुद्दों ने सरकार और विपक्ष दोनों पर दबाव बढ़ा दिया है।