हरीश जोशी/पहाड़ का सच
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का देश प्रेम, आदर्श और कार्य आज के समय में न केवल प्रासंगिक हैं, बल्कि आधुनिक समाज की कई समस्याओं का समाधान भी हैं।
दोनों महापुरुषों के विचार और जीवन मूल्य समय की सीमाओं से परे हैं। आज जब समाज में नैतिक मूल्यों में गिरावट आ रही है, पर्यावरण खतरे में है और आपसी अविश्वास बढ़ रहा है, तब इन दोनों महापुरुषों का जीवन हमारे लिए एक प्रकाश स्तंभ की तरह है। गांधी के ‘नैतिक विचार’ और शास्त्री के ‘प्रशासनिक व व्यावहारिक कदम’ मिलकर एक आदर्श और मजबूत भारत का निर्माण कर सकते हैं।
महात्मा गांधी के आदर्शों की प्रासंगिकता
• सत्य और अहिंसा : आज जब दुनिया युद्ध, आतंकवाद और वैचारिक कट्टरता से जूझ रही है, गांधी की अहिंसा की नीति सबसे बड़ा हथियार है. उनका मानना था कि हिंसा से केवल नई समस्याएं पैदा होती हैं, जबकि बातचीत और शांति से स्थाई समाधान निकाला जा सकता है.
•. सत्याग्रह : अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध (जैसे शांतिपूर्ण आंदोलन और प्रदर्शन) आज भी लोकतंत्र की आत्मा है. गांधी का यह तरीका नागरिकों को बिना हथियार उठाए अपनी आवाज उठाने की शक्ति देता है.
• स्वच्छता और पर्यावरण : गांधी कहते थे कि “स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है.” आज भारत सरकार का ‘स्वच्छ भारत अभियान’ इसी विचार पर आधारित है. इसके अलावा, उनका यह विचार कि “धरती हर इंसान की जरूरत को पूरा कर सकती है, लालच को नहीं” आज के जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट के दौर में सबसे बड़ी सीख है.
• स्वदेशी और आत्मनिर्भरता : स्थानीय उद्योगों और खादी को बढ़ावा देने का गांधीवादी विचार आज के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के रूप में जीवित है। यह आर्थिक असमानता को कम करने का एक बेहतरीन जरिया है।
लाल बहादुर शास्त्री के आदर्शों की प्रासंगिकता
• ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा: शास्त्री का यह नारा आज भी भारत की रीढ़ है। कोरोना महामारी और वैश्विक संकटों के समय यह साबित हो गया कि देश की सुरक्षा (जवान) और खाद्य सुरक्षा (किसान) के बिना कोई भी देश खड़ा नहीं रह सकता। आज कृषि तकनीकों को आधुनिक बनाना और सैनिकों को मजबूत करना इसी प्रासंगिकता का हिस्सा है।
• सादगी और ईमानदारी : आज के राजनीतिक दौर में जहां भ्रष्टाचार और पद का अहंकार आम बात हो गई है, शास्त्री का जीवन एक आदर्श है. प्रधानमंत्री रहते हुए भी उनके पास अपनी कार खरीदने के पैसे नहीं थे और उन्होंने बैंक से लोन लिया था. उनकी यह ईमानदारी आज के जनप्रतिनिधियों के लिए एक बड़ा सबक है.
• नैतिक जिम्मेदारी : एक रेल दुर्घटना होने पर शास्त्री ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था. आज के समय में जवाबदेही और नैतिकता से बचने वाले नेताओं के लिए उनका यह कदम राजनीति के उच्चतम स्तर को दर्शाता है.
• संकट में दृढ़ संकल्प : 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और देश में अन्न संकट के समय शास्त्री ने देश को एक सूत्र में पिरोया. उन्होंने खुद एक वक्त व्रत रखकर देशवासियों से ऐसा करने की अपील की थी. उनका यह संकट प्रबंधन आज की सरकारों के लिए भी मार्गदर्शक है.

