पहाड़ का सच/एजेंसी।
नई दिल्ली। आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि विकास के केंद्र में समाज के अंतिम व्यक्ति का कल्याण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास के उच्चतम और निम्नतम स्तरों के बीच का अंतर कम से कम होना चाहिए। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर उन्होंने कहा कि ‘अंत्योदय’ की अवधारणा का मूल अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि समाज का अंतिम व्यक्ति भी अधिक से अधिक सुखी रहे। मोहन भागवत ने कहा, ‘देश सुखी हो, इसके लिए समाज के अंतिम व्यक्ति का सुखी होना आवश्यक है, इसी को अंत्योदय कहा जाता है। उन्होंने किसानों को कर्ज के जाल में नहीं फंसने की सलाह दी।
आरएसएस चीफ ने कहा कि विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि हर कोई एक ही स्तर पर पहुंच जाए, लेकिन असमानता को न्यूनतम किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘कुछ लोग कह सकते हैं कि इतने बड़े समाज में सभी विकास के एक स्तर पर नहीं हो सकते। यह ठीक भी है, लेकिन विकास के निम्नतम और उच्चतम स्तरों के बीच अंतर यथासंभव कम से कम होना चाहिए।’ जनसंघ के दिवंगत नेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वह विकास की उस परिभाषा को स्वीकार नहीं करते थे, जिसमें अधिकतम लोगों का अधिकतम भला स्वीकार किया जाता है।
मोहन भागवत ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि विकास ऐसा होना चाहिए, जिससे सभी का कल्याण हो। महात्मा गांधी के सिद्धांत को याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी फैसला लेते समय समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का ध्यान रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘जब भी आप जीवन में कुछ सोचते हैं तो समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के बारे में सोचिए। खुद से पूछिए कि जो मैं कर रहा हूं, क्या उसका लोगों के जीवन पर सकारात्मक असर पड़ेगा। अगर ऐसा है तो कीजिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो, वह काम करने की जरूरत नहीं है।
उन्होंने कहा कि विकास ऐसा होना चाहिए जिससे भोजन, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी हों, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक सबकी पहुंच हो। उन्होंने लोगों के सम्मान के साथ रहने और दूसरों का सम्मान करने की बात भी कही। कृषि और किसानों के कल्याण पर बात करते हुए भागवत ने जैविक खेती, मिश्रित खेती, पशुपालन, बीज और खाद के मामले में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की बात कही। उन्होंने कहा कि लक्ष्य यह होना चाहिए कि किसान कर्ज के जाल में न फंसें और अधिक आत्मनिर्भर बनें।

