
बिहार की बांकीपुर विसभा सीट उपचुनाव में जनसुराज के प्रशांत ने भाजपा को दी मात
दतिया (मप्र) में कांग्रेस व गुजरात में भाजपा जीती
मध्य प्रदेश की दतिया सीट में कांग्रेस व गुजरात में भाजपा जीती, तीनों राज्यों में है भाजपा की सरकारें
जेन-जी आंदोलन के बाद हुए चुनाव में तीन में से दो सीटें भाजपा हारी
पहाड़ का सच/एजेंसी
नई दिल्ली। तीन राज्यों बिहार, मध्य प्रदेश व गुजरात की तीन विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा को बड़ा झटका बिहार में लगा है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई बांकीपुर सीट पर जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के हाथों भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी है।

मध्य प्रदेश के दतिया में कांग्रेस और गुजरात के मांजलपुर में भाजपा को जीत मिली। इन तीनों राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकार है। सबकी निगाहें बांकीपुर पर थीं, जहां पिछले तीन दशक से भाजपा का वर्चस्व था। यहां पार्टी 1995 से कोई चुनाव नहीं हारी थी। पर, नीतीश कुमार के सीएम पद से हटने और सम्राट चौधरी की ताजपोशी के बाद पहले चुनाव में ही हार झेलनी पड़ी। वहीं, दतिया में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,016 और मांजलपुर में भाजपा के सतीश पटेल ने कांग्रेस की भीखा रबारी को 30,630 वोट से हराया।
बांकीपुर में जनसुराज
वर्चस्व खत्म : 30 साल, एक परिवार 3 बार पिता, नवीन 5 बार विधायक
प्रशांत किशोर व भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार दोनों पहली बार चुनावी मैदान में थे। पीके ने नीरज को 19,324 वोटों से हराया। प्रशांत को 64,151, नीरज को 44,827 और राजद की रेखा गुप्ता को 14,273 वोट मिले। नौ माह पहले हुए विधानसभा चुनावों में जन सुराज का खाता भी नहीं खुला था।
बांकीपुर में नितिन नवीन लगातार 5 बार और पिता दिवंगत नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा लगातार तीन बार विधायक रहे। इस बार वर्चस्व टूट गया।
जीत-हार की बड़ी वजहें
बिहार : भरत एनकाउंटर और छात्रों का गुस्सा ले डूबा
भाजपा बांकीपुर में आखिरी वक्त तक उधेड़बुन में रही जिसे उम्मीदवार घोषित किया, नामांकन खत्म होने से एक दिन पहले बदल दिया। इससे वोटरों में निराशा फैली। कई लोग वोट देने घर से नहीं निकले। भरत तिवारी के एनकाउंटर को लेकर सवर्णों में भारी नाराजगी थी। इस मामले में कार्रवाई में सरकार की देरी ने इसे गुस्से में बदल दिया। दिल्ली में जेन-जी व बिहार में छात्रों के आंदोलन ने युवाओं में प्रशांत के प्रति आकर्षण बढ़ा दिया।
मध्य प्रदेश : तीसरे प्रत्याशी के 22 हजार वोटों ने किया खेल
दतिया में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता ऐसे नाराज हुए कि नरोत्तम के बूथ पर भी पार्टी को हार मिली। बड़ा झटका चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी ने दिया। पार्टी के दामोदर यादव मंडल को 22,527 वोट मिले। भाजपा यहां सिर्फ 6,016 वोटों से हारी।
आशुतोष पहली बार मैदान में थे। नरोत्तम फैक्टर के चलते बड़े पैमाने पर भितरघात हुआ, जिसका फायदा उठाकर कांग्रेस ने सीट बरकरार रखी। भाजपा को भरोसा था कि टिकट जिसे भी देंगे, वह जीत ही जाएगा परंतु यह आत्म विश्वास पार्टी पर भारी पड़ा।
62 फीसद वोट पाने वाली भाजपा 34 फीसद पर सिमट गई। कुल वोटों का 49 फीसद हिस्सा प्रशांत किशोर को गया। पिछले चुनाव में राजद के पारंपरिक यादव और मुस्लिम वोटरों ने पीके की जीत भांपकर रुख बदल लिया। इससे रेखा गुप्ता की जमानत जब्त हो गई। पिछले चुनाव में राजद उम्मीदवार दूसरे नंबर पर थीं।
गुजरात: दबदबा कायम, मगर जीत का अंतर 70 फीसद घट गया
गुजरात की पटेल बहुल मांजलपुर सीट पर भाजपा का दबदबा कायम रहा, मगर जीत का अंतर 70 फीसद कम हो गया।
पिछले चुनाव में भाजपा उम्मीदवार एक लाख से अधिक वोटों से जीता था। उपचुनाव में यह अंतर सिर्फ 30,630 वोट का रह गया। यह सीट तीन बार के विधायक योगेश पटेल के निधन से खाली हुई थी। यहां पूर्व पार्षद सतीश पटेल कांग्रेस के पूर्व मंत्री भीखाभाई रबारी पर भारी पड़े। तीन में से दो सीटों पर हार का झटका लगा है, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर विपक्षी दलों और नए राजनीतिक संगठनों (जैसे जनसुराज) को मजबूती मिलने की संभावना बढ़ गई है।
नितिन(भाजपा) के गढ़ में प्रशांत किशोर की ” एंट्री”
उपचुनावों को अक्सर केवल रिक्त सीटों को भरने की औपचारिक प्रक्रिया मान लिया जाता है, लेकिन कई बार यही छोटे चुनाव बड़े राजनीतिक संदेश लेकर आते हैं। बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की उपचुनावों ने भी यही साबित किया है। तीनों ही सीटों के नतीजों ने दतिया और गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीटों के राजनीतिक दलों के संगठन, नेतृत्व, उम्मीदवारों के चयन और जनभावनाओं को समझने के संबंध में अहम संकेत दिए हैं।
सर्वाधिक चर्चा बिहार की बांकीपुर सीट की रही, जहां भाजपा के तीन दशक पुराने गढ़ को ध्वस्त करते हुए प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी पहली बार विधानसभा तक पहुंच गई है। भारतीय जनता से एपार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष नितिन नवीन के गढ़ में प्रशांत किशोर की यह जीत कितनी प्रभावशाली रही, इसका अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि मतों की गिनती के पहले से लेकर अंतिम चरण तक एक बार भी भाजपा प्रत्याशी उनसे आगे नहीं बढ़ सका।
बांकीपुर की जीत दरअसल उस राजनीतिक प्रयोग की पहली ठोस सफलता है, जिसे प्रशांत किशोर पिछले कुछ वर्षों से बिहार में खड़ा करने कोशिश कर रहे थे। भाजपा ने अभिषेक कुमार बंटी को उम्मीदवार बनाया और नामांकन से ठीक पहले उनका नाम वापस लेकर नए चेहरे को मैदान में उतारा जो जमानत तक नहीं बचा सका । लिहाजा, इस जीत का श्रेय प्रशांत किशोर को मिलना ही चाहिए, पर इसके लिए भाजपा की अपनी रणनीतिक भूलें बनाना, फिर उनसे नामांकन वापस कराते हुए आनन-फानन में एक अनजान चेहरे को मैदान में उतारे जाने से कार्यकर्ताओं में स्वाभाविक ही भ्रम की स्थिति पैदा हुई, जिससे मतदाताओं में पार्टी की छवि पर भी यकीनन असर पड़ा होगा।
दूसरी ओर, प्रशांत किशोर ने ई-20 और खासकर पटना में नीट परीक्षा आंदोलन जैसे मुद्दों से उपजी नाराजगी को प्रभावी ढंग से अपने पक्ष में मोड़ लिया। गुजरात की मांजलपुर सीट पर भाजपा ने राज्य में अपनी मजबूत स्थिति जरूर साबित की है, लेकिन मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर मिली हार से एक बार फिर भाजपा के भीतर पनप चर्चाएं लगातार होती रहीं। यह संदेश भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के लिए एक सबक के तौर पर भी होगा वो ये कि चुनाव के दौरान कार्यकर्ताओं की नाराजगी और कथित भितरघात जैसी प्रवृत्तियां चुनावी मैदान में घातक साबित हो सकती हैं। प्रशांत किशोर के लिए यह जीत उत्साहजनक है, पर इस जीत का श्रेय जितना उनको है, उतना ही भाजपा की रणनीतिक भूलों को भी है।

