
गणेश नेगी की कलम से
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से आज पलायन केवल लोगों के अन्यत्र मैदानी क्षेत्रों की तरफ जाने का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह रिश्तों, सामाजिक ढांचे और भविष्य की निरंतरता का संकट बन चुका है। गांवों का खाली होना सिर्फ जनसंख्या का कम होना नहीं है। यह उस सांस्कृतिक ताने-बाने का टूटना है, जिसमें पीढ़ियों की परंपराएं, रिश्ते और सामूहिक जीवन बसता था।
आज स्थिति यह है कि युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जा रहे हैं और जो पीछे रह गए हैं, उनके सामने विवाह जैसे सामाजिक संतुलन का भी संकट खड़ा हो गया है।

*“मैथै ब्योला बनै द, मेखु ब्योली खुजै द…”*
कभी खुशियों का प्रतीक रहा प्रसिद्ध गढ़वाली गीत आज हजारों युवाओं की अधूरी कहानी बन गया। पहाड़ की ठंडी हवा में आज भी एक धुन तैरती है. “मैथै ब्योला बनै द, मेखु ब्योली खुजै द…” कभी यह गीत गांवों की खुशियों, शादियों की रौनक और नए रिश्तों की शुरुआत का प्रतीक हुआ करता था। हर घर में शहनाई की गूंज, हर आंगन में बारात का इंतजार लेकिन आज वही गीत एक सवाल बनकर गूंज रहा है। क्या पहाड़ों में अब दूल्हा बनने का सपना अधूरा रह जाएगा?
*दुल्हन के इंतजार में गुजर गई आधी उम्र*
गढ़वाल और कुमाऊं के पहाड़ी जिलों में एक खामोश संकट गहराता जा रहा है। 25–30 ही नहीं, बल्कि 40 साल की उम्र पार कर चुके हजारों युवा आज भी कुंवारे हैं। मैदानी इलाकों में जहां शादी समय पर हो जाती है, वहीं पहाड़ों में उम्र गुजर रही है। रिश्ते नहीं मिल रहे.ल। गांवों की चौपाल पर अब शादियों की बातें कम और चिंता ज्यादा होती है। क्यों नहीं मिल रही दुल्हन? इस सवाल का जवाब एक नहीं, बल्कि कई परतों में छिपा है।
पहाड़ की बेटियां पढ़ाई और नौकरी के लिए शहरों की ओर बढ़ रही हैं और फिर वहीं बस जा रही हैं। अब शादी सिर्फ रिश्ता नहीं, सेटलमेंट बन गई है। कई युवतियों के लिए शहर में मकान और सरकारी नौकरी पहली शर्त है। पहाड़ों में नौकरी, व्यापार और संसाधनों की कमी युवाओं को पीछे कर रही है। इसके अलावा शिक्षा और जागरूकता ने विवाह को लेकर नजरिया बदल दिया है। अब जल्दी शादी जरूरी नहीं, सही जीवन ज्यादा जरूरी है।
*“ब्यौथियों” की टोली जोड़ती थी रिश्ते*
पहाड़ में एक समय था जब गांवों में “ब्यौथियों” की टोली रिश्ते जोड़ती थी। घर-घर जाकर लड़के-लड़कियों के रिश्ते तय होते थे। शादी सिर्फ एक समारोह नहीं, पूरे गांव का त्योहार होता था, लेकिन आज रिश्ते ढूंढना मुश्किल है। बढ़ती उम्र और ढलती जवानी सिर्फ युवाओं की समस्या नहीं रही है बल्कि मां-बाप के लिए परेशानी का सबब बन गई है। उनका दादा-दादी बनने का सपना अधूरा होता जा रहा है, वहीं बुढ़ापे का सहारा भी कमजोर लगता है। पहाड़ी क्षेत्रों के गांवों में खाली होते आंगन और सूनी चौपालें अब इस बदलाव की गवाही दे रही हैं। स्थानीय रिपोर्टों और सामाजिक अध्ययनों के अनुसार पौड़ी गढ़वाल, टिहरी, चमोली, उत्तरकाशी जिले में बड़ी तादाद में 30–40 साल के अविवाहित युवा हैं। अल्मोड़ा, बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिले के दूरस्थ गांवों में स्थिति और भी गंभीर बनी हुई है। इन जिलों में युवतियों की संख्या अपेक्षाकृत कम है चूंकि वे शिक्षा और करियर के लिए शहरों में बस रही हैं।
ज्योतिषाचार्य मानते हैं कि विवाह में देरी ग्रह दशा का असर हो सकता है, लेकिन आज की सबसे बड़ी वजह सामाजिक बदलाव है। अब कुंडली से ज्यादा हालात रिश्ते तय कर रहे हैं। सवाल ये है कि क्या पहाड़ों में रोजगार बढ़ाए बिना यह संकट खत्म होगा? क्या गांवों में बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और इंटरनेट जरूरी नहीं? क्या समाज को अपनी सोच में संतुलन लाना होगा? अंतिम सच्चाई यही है कि “मैथै ब्योला बनै द…” अब सिर्फ एक गीत नहीं, एक अधूरी चाह है।
*पंडितों की दक्षिणा पर भी संकट*
पहाड़ों से हो रहे पलायन, घटती आबादी और गांवों में शादियों की संख्या में भारी गिरावट के कारण स्थानीय पंडितों के समक्ष आजीविका का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। कर्मकांड ही मुख्य आय का साधन होने से कई पुरोहित परिवारों को अपने दैनिक खर्चों को चलाना मुश्किल हो रहा है। बड़े पारंपरिक आयोजनों में कमी आने से पंडितों की दक्षिणा और आय लगभग समाप्त हो गई है। आधुनिकता के इस दौर में उनके पास वैकल्पिक रोजगार का अभाव है।
*पंडित और यजमान बन रहे समधी-समधन*
पहाड़ के दूरदराज के इलाकों से रोजगार के लिए युवाओं के शहरों में बस जाने से गांवों में कुंवारे लड़कों की संख्या बढ़ गई है, साथ ही लिंगानुपात में असंतुलन और गांवों से पलायन के कारण लड़कों के लिए दुल्हन मिलना एक बड़ा संकट बन गया है। जिन परिवारों में शादी की रस्में पूरी कराने वाले पंडित जाते हैं, उनके स्वयं के परिवारों में विवाह योग्य लड़कियां होने पर, वे बिना किसी संकोच के अपने यजमानों के साथ बेटी और बेटों का रिश्ता जोड़ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर अब ऐसे अंतर्जातीय और अंतर-गोत्रीय विवाहों को समाज की मान्यता मिल रही है. क्योंकि कुंवारों के लिए घर बसाना पहली प्राथमिकता बन गया है।
अगर उत्तराखंड में पलायन, रोजगार और सामाजिक सोच पर समय रहते काम नहीं हुआ तो आने वाले समय में गांव और खाली होंगे। रिश्ते और दूर होंगे और पहाड़ों की खुशियां सच में सूनी पड़ जाएंगी. क्योंकि पहाड़ में अब युवा तो हैं, पर युवतियां कहीं और बस चुकी हैं।
सरकार और सभी राजनीतिक दलों को केवल चुनावी मुद्दों तक सीमित न रहकर दीर्घकालिक नीति पर काम करना होगा। गांवों में सकारात्मक माहौल और पारिवारिक मूल्यों को पुनर्जीवित करना होगा। यह मुद्दा राजनीति से ऊपर उठकर सोचने का है। अगर आज ठोस रणनीति नहीं बनाई गई तो आने वाले समय में केवल घर ही नहीं, पूरे के पूरे गांव इतिहास बन जाएंगे।
उत्तराखंड का भविष्य में सिर्फ शहरों में नहीं, उसके गांवों में बसता है और उन गांवों को बचाने के लिए आज ही सामूहिक चिंतन और मंथन की जरूरत है।

