
सोमनाथ अमृत महोत्सव’ पर विशेष

11 मई, 2026 का दिन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष पूर्ण होने का गवाह बन गया है। ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’, उस सनातन चेतना, आध्यात्मिक शक्ति और सांस्कृतिक अमरत्व का प्रतीक बन गया है, जिसने हजारों वर्षों से भारत की आध्यात्मिक आत्मा को प्रकाशित किया है। सनातन वह दिव्य प्रवाह है, जिसने मानवता को धर्म, करुणा, मर्यादा और लोक कल्याण का मार्ग दिखाया है तथा भारत की आध्यात्मिक आत्मा को जीवंत बनाए रखा है।
अरब सागर के तट पर स्थित भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ मंदिर, भारत की प्राचीन आध्यात्मिक समृद्धि,
सांस्कृतिक वैभव और राष्ट्रीय स्वाभिमान का केंद्र रहा है। इतिहास गवाह है कि विदेशी आक्रमणकारियों ने इसे भारत की आस्था पर प्रहार का माध्यम माना. 1025 ईस्वी में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कर इसे ध्वस्त किया और अपार संपदा लूटी। इसके बाद भी कई बार मंदिर को नष्ट करने के प्रयास हुए, किंतु हर बार समाज ने अपनी आस्था और सामर्थ्य से इसका पुनर्निर्माण किया। यही कारण है कि आज सोमनाथ भारतीय सनातन शक्ति का प्रमुख प्रतीक माना जाता है।
स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस प्रक्रिया से सहमत नहीं थे और तत्कालीन राष्ट्रपति डा राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन समारोह में जाने से भी हतोत्साहित किया। हालांकि, सरदार पटेल अपने इस महान संकल्प को पूर्ण स्वरूप में नहीं देख पाए, जिसके लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया था। उनका संकल्प केएम मुंशी सहित अनेक राष्ट्रनिष्ठ व्यक्तित्वों ने आगे बढ़ाया। वर्ष 1951 में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर राष्ट्र को समर्पित किया गया और डा. राजेंद्र प्रसाद उद्घाटन समारोह में शामिल हुए।
आज 75 वर्षों बाद वही चेतना नए भारत के आत्मविश्वास में दिखाई देती है. .पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय संस्कृति को राष्ट्रजीवन की आधारशिला मानते थे. वह कहा करते थे ‘भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता जागता राष्ट्रपुरुष ह. उनका विश्वास था कि आधुनिकता तब तक अधूरी है, जब तक वह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी न हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक में भारत ने अपनी सभ्यतागत विरासत को
विकास की मुख्यधारा में स्थापित करने का ऐतिहासिक प्रयास किया है।
प्रधानमंत्री बनने से पहले भी वह लंबे समय तक श्री सोमनाथ ट्रस्ट से जुड़े रहे और वर्तमान में भी इसके अध्यक्ष हैं. .वर्ष 2021 में उन्होंने सोमनाथ में 83 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया, जिनमें समुद्र दर्शन पथ, प्रदर्शनी केंद्र, आधुनिक यात्री सुविधाएं और मंदिर परिसर का पुनर्विकास शामिल है। परिणामस्वरूप, सोमनाथ आज विश्वस्तरीय आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। इसी प्रकार काशी विश्वनाथ धाम परियोजना सांस्कृतिक पुनर्जागरण का ऐतिहासिक उदाहरण बनी. वर्षों तक संकरी गलियों में घिरा काशी विश्वनाथ मंदिर आज भव्य स्वरूप में है। अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर का निर्माण स्वतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यों में गिना जा रहा है।
उज्जैन का महाकाल लोक भी भारत की प्राचीन शैव परंपरा की भव्य प्रस्तुति के रूप में उभरा है. देवभूमि उत्तराखंड में वर्ष 2013 की आपदा के बाद केदारनाथ धाम के पुनर्निर्माण को लेकर अनेक आशंकाएं थीं, लेकिन आज वहां सुरक्षा दीवार, नए घाट, तीर्थ पुरोहित आवास, आधुनिक सुविधाएं और आदि शंकराचार्य की भव्य समाधि पुनस्थापित की जा चुकी हैं।
बदरीनाथ मास्टर प्लान, चारधाम आल वेदर रोड, ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल परियोजना, मानसखंड मंदिर माला मिशन, आदि कैलास यात्रा मार्ग जैसे कार्य उत्तराखंड को आध्यात्मिक, सामरिक दृष्टि से नई शक्ति दे रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत का सांस्कृतिक नवोदय विविध आस्थाओं को समान भाव से आत्मसात कर रहा है। वर्ष 2019 में करतारपुर कारिडोर खुलने के बाद भारतीय श्रद्धालुओं को बिना वीजा पाकिस्तान स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब पहुंचने का अवसर मिला। गुरु गोविंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों के बलिदान को ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में राष्ट्रीय मान्यता दी गई।
आज भारत का युवा अपनी परंपराओं को संकोच नहीं, गर्व के साथ देख रहा है। योग, आयुर्वेद, गीता और भारतीय दर्शन के प्रति विश्वभर में बढ़ता आकर्षण भारत की आध्यात्मिक शक्ति का प्रमाण है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से लेकर वैश्विक मंचों पर भारतीय संस्कृति के प्रभाव तक, भारत विश्व में आध्यात्मिक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर रहा है। मेरे लिए प्रधानमंत्री मोदी जी सदैव अभिभावक, प्रेरणास्त्रोत पथप्रदर्शक के रूप में रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने जिस प्रकार विकास और विरासत को आगे बढ़ाकर भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को विश्व मंच पर नई प्रतिष्ठा विलाई है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। .सोमनाथ के 75 वर्ष केवल ऐतिहासिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की उस अजेय चेतना का उत्सव है, जिसने हर संकट के बाद स्वयं को और अधिक शक्ति के साथ स्थापित किया. सनातन किसी एक उपासना पद्धति तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति, मानवता, सह अस्तित्व, करुणा और वसुधैव कुटुंबकम का दर्शन है। आधुनिकता और आध्यात्मिकता को साथ लेकर आगे बढ़ता भारत आज विश्व को यह संदेश दे रहा है कि सनातन मानव सभ्यता के कल्याण का शाश्वत मार्ग है।
(लेखक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हैं)

