हिमालय केवल बर्फ से ढके पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह एशिया की विशाल आबादी की जीवन रेखा है
हरीश जोशी/पहाड़ का सच देहरादून। हर साल नौ सितंबर को ‘हिमालय दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के संरक्षण के प्रति लोगों और नीति-निर्माताओं को जागरूक करना है। हिमालय केवल बर्फ से ढके पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह एशिया की विशाल आबादी की जीवन रेखा है।
देश की जलवायु को नियंत्रित करने से लेकर गंगा, यमुना, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी बारहमासी नदियों को जल प्रदान करने तक, हिमालय का भारतीय उपमहाद्वीप पर गहरा उपकार है लेकिन आज वैश्विक तापमान (Global Warming) और अनियोजित विकास के कारण यह रक्षक खुद संकट में है। वर्तमान समय में हिमालय अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रहा है।
वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले तीन दशकों में हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने की दर दोगुनी हो चुकी है। वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक, हिमालय के ग्लेशियर हर साल औसतन 18 से 19 मीटर पीछे खिसक रहे हैं। अकेले उत्तराखंड में ही सैकड़ों छोटे-बड़े ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं। यदि यही गति रही, तो भविष्य में इन नदियों पर निर्भर करीब 44 करोड़ आबादी के सामने जल संकट खड़ा हो जाएगा। .हिमालयी क्षेत्रों में सर्दियों के मौसम में होने वाली पारंपरिक बर्फबारी में भारी गिरावट आई है। शीतकालीन न्यूनतम तापमान में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, जिससे बर्फ की परतें पतली हो रही हैं। बर्फ की कमी के कारण पहाड़ों का स्वरूप पथरीला हो रहा है और यह स्थिति रबी की फसलों तथा जलविद्युत परियोजनाओं को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।
वैज्ञानिक जांच कहती हैं कि ग्लेशियर सिर्फ बढ़ते तापमान से ही नहीं पिघल रहे, बल्कि वाहनों, उद्योगों और पराली जलाने से निकलने वाला ‘ब्लैक कार्बन’ (कालिख) उड़कर बर्फ पर जमा हो रहा है। यह कालिख सूरज की रोशनी को सोख लेती है, जिससे बर्फ के पिघलने की रफ्तार और अधिक बढ़ जाती है।
अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Floods), और भूस्खलन की घटनाएं अब आम हो चुकी हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से बनने वाली कृत्रिम झीलें (GLOF) पहाड़ों के टूटने से अचानक फट जाती हैं, जिससे निचले इलाकों में भारी तबाही मचती है। जलवायु संकट के साथ-साथ मानवीय हस्तक्षेप ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। संवेदनशील पहाड़ी ढलानों पर अंधाधुंध होटल, सड़कें और जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण पहाड़ों की प्राकृतिक स्थिरता को कमजोर कर रहा है, जिससे पूरा इकोसिस्टम संवेदनशील हो गया है।
हिमालय की इस दुर्दशा का सीधा असर स्थानीय जनजीवन पर पड़ रहा है। पानी के पारंपरिक स्रोत (जैसे धारे और नौले) सूख रहे हैं। खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है, जिसके कारण पहाड़ी क्षेत्रों से पुरुषों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। इसके अलावा, जंगलों में बढ़ती आग और मोनोकल्चर (एक ही प्रकार के वृक्षारोपण) के कारण हिमालय की कार्बन सोखने की क्षमता भी घट रही है, जिससे यह क्षेत्र खुद कार्बन रिसाव का जरिया बनता जा रहा है।
पहाड़ी राज्यों के लिए मैदानों से अलग एक ऐसा संधारणीय (Sustainable) विकास मॉडल बनना चाहिए जो पर्यावरण के अनुकूल हो।संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या और बुनियादी ढांचे के निर्माण की एक तार्किक सीमा (Carrying Capacity) तय होनी चाहिए। ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए हरित ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
वनों के संरक्षण और पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने में स्थानीय समुदायों को शामिल करना सबसे प्रभावी कदम होगा। हिमालय भारत का मस्तक और हमारी समृद्धि का आधार है। यदि हिमालय का पर्यावरण नष्ट होता है, तो पूरे उपमहाद्वीप का मौसम चक्र, कृषि और जल सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। हिमालय दिवस हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद कर हमें इस ‘थर्ड पोल’ को बचाने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास करने होंगे, ताकि आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य मिल सके।

