राज्य में सियासी हलचल से करीब यह साफ होता जा रहा है कि उत्तराखंड में 2027 के चुनाव का मुख्य एजेंडा तय होना शुरू हो चुका है। कांग्रेस जहां ‘सामाजिक न्याय और अस्मिता’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ना चाहती है, वहीं भाजपा कांग्रेस पर ‘तुष्टिकरण और समाज को बांटने वाली राजनीति’ का ठप्पा लगाकर इसे ‘सामाजिक सौहार्द’ के काउंटर-नैरेटिव से मात देने की रणनीति अपना रही है।
हरीश जोशी/पहाड़ का सच देहरादून।
मुख्यमंत्री आवास कूच के जवाब में प्रदेशव्यापी ‘सामाजिक सौहार्द संकल्प धरना’ सत्तारूढ़ दल भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है जिसमें वह काउंटर नैरेटिव से आक्रामक होती कांग्रेस को मात देने की कोशिश कर रही है। देहरादून में कांग्रेस का ‘हल्ला बोल/सीएम आवास कूच’ में कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा और प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में परेड ग्राउंड से हजारों कार्यकर्ता खराब मौसम और तेज बारिश के बावजूद सड़कों पर उतरे। हाथीबड़कला के पास पुलिस ने भारी बैरिकेडिंग कर प्रदर्शनकारियों को रोका, जिसके बाद पुलिस और कांग्रेसी नेताओं के बीच तीखी धक्का-मुक्की हुई और कई नेताओं को हिरासत में भी लिया गया।
यह प्रदर्शन मूल रूप से हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद कथित ‘शुद्धिकरण यज्ञ’ (जिसके विरोध में खरगे ने अपनी दलित पहचान को लेकर सवाल उठाए थे) और राहुल गांधी पर दर्ज हुई एफआईआर के विरोध में था. इसके अलावा पार्टी ने पेपर लीक, बढ़ती बेरोजगारी और कानून व्यवस्था को भी मुद्दा बनाया।
लंबे समय से अंदरूनी गुटबाजी से जूझ रही कांग्रेस को हाल में किए गए आंदोलन से कुछ फायदे मिलते दिख रहे हैं. दरअसल, राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली स्थल के ‘शुद्धिकरण’ को कांग्रेस ने सीधे तौर पर दलित अस्मिता और सम्मान से जोड़ दिया है। इससे कांग्रेस राज्य के करीब 18-20 फीसद अनुसूचित जाति (SC) वोट बैंक को अपने पाले में खींचने की कोशिश कर रही है। विधानसभा चुनाव से पहले इतने बड़े स्तर पर कार्यकर्ताओं का सड़क पर उतरना यह दर्शाता है कि कांग्रेस कैडर में जान फूंकने में सफल रही है। प्रदेश कांग्रेस ने कुमारी सैलजा की मौजूदगी ने विभिन्न गुटों को एक मंच पर लाने का काम किया है।
राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर फ्रंट फुट पर खेलकर कांग्रेस ने खुद को राज्य में भाजपा के खिलाफ एकमात्र मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित किया है। दूसरी तरफ कांग्रेस के आक्रामक रुख को भांपते हुए भाजपा ने भी उसी दिन राज्य के सभी संगठनात्मक जिलों और मंडलों में ‘सामाजिक सौहार्द संकल्प धरना’ आयोजित कर कांग्रेस को काउंटर देने की कोशिश की है. भाजपा के अनुसूचित जाति (SC) मोर्चा ने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की प्रतिमाओं के सामने यह प्रदर्शन कर खुद को संविधान की मूल भावना से जोड़ने के प्रदर्शन किया।

भाजपा अब भी कह रही है कि हल्द्वानी का सफाई अभियान एक सामान्य कार्यक्रम था, जिसे कांग्रेस जबरन ‘जातिगत रंग’ दे रही है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस समाज को बांटकर राजनीतिक रोटियां सेकना चाहती है। भाजपा के कई नेता लगातार सफाई देते आ रहे हैं कि पार्टी किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव का समर्थन नहीं करती। धरना देकर भाजपा जनता को यह संदेश देना चाहती थी कि वह समाज के सभी वर्गों का सम्मान करती है। पूर्ण बहुमत वाले सत्तारूढ़ दल का विपक्षी दल कांग्रेस के प्रदर्शन के जवाब में तुरंत पूरे प्रदेश के मंडलों में धरना दे देना बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत देता है। भाजपा यह भली-भांति जानती है कि यदि कांग्रेस दलित कार्ड खेलने में सफल रही, तो आगामी विधानसभा चुनाव में उसे नुकसान हो सकता है।
इसलिए भाजपा ने तुरंत अपने SC मोर्चे को सक्रिय कर डैमेज कंट्रोल शुरू कर दिया। भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस बनाम राष्ट्र/समाज के रूप में पेश कर रही है. भाजपा नेताओं ने धरने में याद दिलाया कि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में बाबासाहेब अंबेडकर को भारत रत्न नहीं दिया था, जिससे वे कांग्रेस के दलित-प्रेम को ‘पाखंड’ साबित कर सके। मंडल स्तर तक धरना देकर भाजपा ने यह सुनिश्चित किया कि कांग्रेस का ‘हल्ला बोल’ केवल देहरादून तक ही सीमित रहे और उसका असर ग्रामीण व स्थानीय क्षेत्रों के मतदाताओं पर न पड़े।
कुल मिलाकर देहरादून की यह सियासी हलचल साफ करती है कि उत्तराखंड में 2027 के चुनाव का मुख्य एजेंडा तय होना शुरू हो चुका है। कांग्रेस जहां ‘सामाजिक न्याय और अस्मिता’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ना चाहती है, वहीं भाजपा कांग्रेस पर ‘तुष्टिकरण और समाज को बांटने वाली राजनीति’ का ठप्पा लगाकर इसे ‘सामाजिक सौहार्द’ के काउंटर-नैरेटिव से मात देने की रणनीति अपना रही है।


