हरीश जोशी/पहाड़ का सच देहरादून।
हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हुए शुद्धिकरण (हवन) को लेकर लगता है कि कांग्रेस और भाजपा के लिए अब ये सियासी मुद्दा बनता जा रहा है चूंकि दोनों दलों के बीच तीव्र राजनीतिक टकराव छिड़ गया है जिसकी तीव्रता हर दिन बढ़ती जा रही है।
इस घटनाक्रम के बाद जैसे हालात बन रहे हैं उन्हें देखकर लगता है कि कांग्रेस इसे राष्ट्रीय स्तर पर दलित अस्मिता और छुआछूत का गंभीर मुद्दा बनाकर भाजपा को घेर रही है, जबकि भाजपा इसे कांग्रेस द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए गढ़ा गया ‘झूठा नैरेटिव’ और समाज को बांटने की कोशिश बताकर आक्रामक पलटवार कर रही है।

इस पूरे प्रकरण के पीछे दोनों दलों के अपने-अपने राजनीतिक समीकरण और रणनीति हैं. खरगे देश के सबसे वरिष्ठ दलित नेताओं में से एक हैं। कांग्रेस इस घटना को सीधे दलित सम्मान से जोड़कर देश और उत्तराखंड के दलित समुदाय को यह संदेश देना चाहती है कि भाजपा राज में उनके शीर्ष नेताओं तक सुरक्षित या सम्मानित नहीं हैं। वैसे भी पिछले कुछ समय से कांग्रेस लगातार ‘संविधान बचाओ’ और सामाजिक न्याय (जैसे जातिगत जनगणना) के मुद्दों पर आक्रामक है। हल्द्वानी की घटना कांग्रेस को अपने इस विमर्श को जमीन पर और मजबूत करने का मौका देती है।
राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य शीर्ष नेताओं द्वारा इस मामले में एफआईआर की मांग करना और इसे छुआछूत का आधुनिक रूप बताना, भाजपा और आरएसएस की सर्वसमावेशी छवि पर चोट करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। उत्तराखंड और राष्ट्रीय राजनीति में दलित मतदाताओं को रिझाने के लिए कांग्रेस इस भावनात्मक मुद्दे को लंबे समय तक चर्चा में बनाए रखना चाहती है ताकि इसका चुनावी लाभ उठाया जा सके।

दूसरी तरफ भाजपा इस मामले में रक्षात्मक होने के बजाय कांग्रेस पर तीखे पलटवार कर रही है, जिसे विपक्षी “आग में घी डालना” कह रहे हैं, लेकिन इसके पीछे भाजपा के अपने तर्क और राजनीतिक हित हैं। भाजपा और अनुष्ठान के आयोजकों (श्री राम सेना) का तर्क है कि इस हवन का जाति से कोई लेना-देना नहीं था। उनका कहना है कि रामलीला मैदान जैसे पवित्र सांस्कृतिक स्थल पर राजनीतिक रैली के बाद फैली गंदगी (जैसे कचरा, गुटखा) को साफ करने और वहां लगे राजनीतिक नारों के शुद्धिकरण के लिए सनातन परंपरा के तहत सामान्य हवन किया गया था।
भाजपा के कई प्रवक्ता आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस अपनी “फ्लॉप रैली” की नाकामी को छुपाने के लिए जानबूझकर समाज में जातिगत विद्वेष फैलाकर हिंदुओं को आपस में लड़ाने का काम कर रही है। भाजपा ने उन बयानों और वीडियो को सामने रखा है जिसमें अनुष्ठान करने वाले कुछ स्थानीय लोग खुद को दलित बता रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्होंने केवल धार्मिक आस्था के कारण सफाई और हवन किया था। इसके जरिए भाजपा कांग्रेस के ‘छुआछूत’ वाले आरोप की हवा निकालना चाहती है।
भाजपा अपनी दलित-हितैषी छवि को बचाने के लिए आक्रामक रुख अपनाकर डॉ. बी.आर. आंबेडकर और बाबू जगजीवन राम जैसे नेताओं के साथ कांग्रेस के पुराने इतिहास का हवाला दे रही है कि कैसे कांग्रेस ने हमेशा दलित नेताओं की उपेक्षा की। मौजूदा वक्त में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और कई केंद्रीय मंत्रियों की नियुक्ति का उदाहरण देकर भाजपा खुद को दलितों का असली शुभचिंतक साबित करने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह विवाद केवल एक स्थानीय घटना तक सीमित नहीं रही। यह ‘सामाजिक न्याय बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की व्यापक राजनीतिक जंग का हिस्सा है, जहां कांग्रेस जातिगत आधार पर भाजपा के हिंदू वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है और भाजपा सांस्कृतिक व धार्मिक तर्कों के जरिए अपने सामाजिक समीकरणों को बिखरने से बचाने का प्रयास कर रही है।

