
दुदबोलि पत्रिका के नवीन अंक ‘हमरि लोक-थात’ का विमोचन
रामनगर। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कुमाउनी साहित्यकार मथुरादत्त मठपाल की पांचवीं पुण्यतिथि पर राजकीय महाविद्यालय मालधनचौड़ में दो दिवसीय कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। .कार्यक्रम में विद्वानों ने मठपाल के साहित्यिक योगदान पर चर्चा की और उत्तराखंड की लोक परंपराओं पर केंद्रित ‘दुदबोलि’ पत्रिका के नवीनतम अंक का विमोचन किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. सुशीला सूद ने की। उन्होंने कहा कि मथुरादत्त मठपाल ने साहित्यिक यात्रा की शुरुआत हिंदी लेखन से की, लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि मातृभाषा कुमाउनी ही उनके भावों की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति का माध्यम है। वर्ष 1997 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने खुद को पूरी तरह कुमाउनी साहित्य सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

उन्होंने बताया कि मठपाल ने वर्ष 2000 में ‘दुदबोलि’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। शुरुआत में यह 60 पृष्ठों की त्रैमासिक पत्रिका थी, जो बाद में 350 पृष्ठों की वार्षिकी के रूप में प्रकाशित होने लगी। पत्रिका में कुमाउनी, गढ़वाली और नेपाली लोक साहित्य को प्रमुखता से स्थान दिया गया।
हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. गिरीश चंद्र पंत ने कहा कि मठपाल को रामगंगा नदी से विशेष लगाव था। उन्होंने रामगंगा पर ‘चली रहप गंग हो’ जैसी लंबी कविता की रचना की और अपने प्रकाशन संस्थान का नाम भी ‘रामगंगा प्रकाशन’ रखा। उन्होंने बताया कि मठपाल ने कभी सरकारी सहायता पर निर्भर हुए बिना साहित्य सेवा को आगे बढ़ाया।
प्रो. पंत ने कहा कि वर्ष 1989 से 1991 के बीच आयोजित क्षेत्रीय भाषायी सम्मेलनों में मठपाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने कुमाऊं में कई कवि सम्मेलनों के आयोजन में सहयोग दिया और रामनगर में ‘बसंती काव्य समारोह’ के तहत सात कवि सम्मेलनों का आयोजन कराया।
कार्यक्रम में डॉ. प्रियदर्शन ने गढ़वाली भाषा में मठपाल के साहित्य पर विचार रखे। डॉ. पी.के. निश्चल और डॉ. प्रदीप चंद ने भी अपने विचार व्यक्त किए। वहीं निधि अधिकारी, आंचल, विशाल मोनिका और डिंपल ने मठपाल की कविताओं का सस्वर पाठ किया।
‘दुदबोलि’ पत्रिका के संपादक चारु तिवारी ने बताया कि इस वर्ष का अंक ‘हमरि लोक-थात’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया है। इसमें उत्तराखंड की लोक विधाओं, संगीत, रंगमंच, सिनेमा और पारंपरिक लोक कलाओं पर लगभग 20 शोधपरक आलेख शामिल किए गए हैं। अंक में झोड़ा, चांचरी, भगनौल, न्यौली और झुमैलो जैसे लोकगीतों के साथ पांडव और जागर गायन पर भी सामग्री प्रकाशित की गई है।
इस अवसर पर नवीन तिवारी, निखिलेश उपाध्याय, सी.पी. खाती, नवेंदु मठपाल, डॉ. पी.के. निश्चल, डॉ. प्रियदर्शन, डॉ. निधि अधिकारी, श्रीमती दीपा पांडेय और भुवन पपनै सहित कई साहित्यप्रेमी मौजूद रहे।

