
हरीश जोशी/पहाड़ का सच ।
जवाहरलाल नेहरू की बेटी होने के नाते राजनीति, इंदिरा गांधी के खून में थी। 1966 में लाल बहादुर शास्त्री के अचानक निधन के बाद जब वे प्रधानमंत्री बनीं, तो विरोधी नेताओं ने उन्हें कमजोर समझकर ‘गूंगी गुड़िया’ कहा था। विरोधी नेताओं का मानना था कि वे उनके इशारों पर चलेंगी।
इंदिरा गांधी ने बहुत जल्द अपनी राजनीतिक चतुरता से वरिष्ठ नेताओं को पछाड़ दिया। 1969 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान उन्होंने पार्टी लाइन से अलग जाकर वी.वी. गिरि का समर्थन किया और कांग्रेस को विभाजित कर दिया। उन्होंने खुद को असली कांग्रेस के रूप में स्थापित किया, जो यह दिखाता है कि वे स्थापित कद्दावर नेताओं के सामने झुकने वाली नहीं थीं।
सामाजिक और आर्थिक नीतियां: ‘गरीबी हटाओ’ और समाजवाद
इंदिरा गांधी का सामाजिक दृष्टिकोण ‘समाजवाद’ की ओर झुका हुआ था। उन्होंने महसूस किया कि भारत के गरीब और वंचित वर्ग को साथ लिए बिना राजनीति में दीर्घकालिक पकड़ नहीं बनाई जा सकती।
उन्होंने 14 प्रमुख निजी बैंकों का सरकारी नियंत्रण में विलय कर दिया। उनके इस कदम ने बैंकिंग सेवाओं को उद्योगपतियों के चंगुल से निकालकर ग्रामीण और मध्यम वर्ग तक पहुंचाया जिससे उन्हें रोजगार के अवसर मिले।
राजा-महाराजाओं को मिलने वाले विशेष भत्ते (प्रिवी पर्स) को समाप्त करके उन्होंने देश में सामंतवाद पर गहरी चोट की और खुद को समानता व सामाजिक न्याय के अग्रदूत के रूप में पेश किया।
• बीस सूत्री कार्यक्रम (1975): भूमि सुधार, खेतिहर मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी और बंधुआ मजदूरी के उन्मूलन जैसे सामाजिक सुधारों पर केंद्रित इस कार्यक्रम ने उन्हें देश के दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का निर्विवाद नेता बना दिया। . दृढ़ विदेश नीति और
भू-राजनीतिक कौशल:
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इंदिरा गांधी ने भारत को एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में स्थापित किया। वे अपने पिता की ‘गुटनिरपेक्ष नीति’ पर तो चलीं, लेकिन राष्ट्रीय हितों के लिए कड़े कदम उठाने से कभी पीछे नहीं हटीं।
1971 का भारत-पाक युद्ध: पाकिस्तान के दो टुकड़े करके बांग्लादेश का निर्माण करवाना उनके राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम काल था। इस जीत के बाद विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी उन्हें ‘दुर्गा’ की संज्ञा दी थी। अमेरिकी दबाव के आगे न झुकना और सोवियत संघ के साथ रणनीतिक संधि करना उनकी मजबूत विदेश नीति का प्रमाण था।
• पोखरण परमाणु परीक्षण (1974): ‘स्माइलिंग बुद्धा’ के नाम से भारत का पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण करके उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि भारत सैन्य और वैज्ञानिक रूप से आत्मनिर्भर हो रहा है।
सत्ता का केंद्रीकरण और आपातकाल (काला अध्याय)
इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन का सबसे विवादित पहलू लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उनकी अति-केंद्रीकृत पकड़ थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: 1975 में जब अदालत ने उनके चुनाव को अवैध घोषित कर दिया, तो अपनी सत्ता बचाने के लिए उन्होंने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया।
आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई और विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इस दौर को भारतीय लोकतंत्र का सबसे अंधकारमय समय माना जाता है। विश्लेषक इसे इंदिरा गांधी के भीतर असुरक्षा की भावना और तानाशाही प्रवृत्ति का मिश्रण मानते हैं।
वापसी और अंतिम दौर
1977 के चुनावों में जनता ने आपातकाल का जवाब देते हुए इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर दिया। लेकिन जनता पार्टी की अंतर्कलह और इंदिरा गांधी की अदम्य इच्छाशक्ति के कारण उन्होंने 1980 में भारी बहुमत से दोबारा सत्ता में वापसी की।ऑपरेशन ब्लू स्टार और शहादत: उनके अंतिम कार्यकाल में पंजाब में उग्रवाद चरम पर था। जून 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को निकालने के लिए उन्होंने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ की अनुमति दी। इस सैन्य कार्रवाई से सिख समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं, जिसके परिणामस्वरूप 31 अक्टूबर 1984 को उनके ही अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी।
इंदिरा गांधी का सामाजिक व राजनीतिक जीवन विरोधाभासों से भरा था। जहाँ एक तरफ वे समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने वाली और वैश्विक मंच पर भारत का मान बढ़ाने वाली एक मजबूत राष्ट्रभक्त नेता थीं, वहीं दूसरी तरफ लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने वाली एक सत्ता-केंद्रीकृत शासक भी थीं। इतिहास उन्हें एक ऐसी नेत्री के रूप में याद रखता है जिसने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके और देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।


