– समाजसेवी संस्था ने निभाया अंतिम संस्कार का फर्ज, वृद्धाश्रम में 8 महीने हुई थी देखभाल
– संस्था का कहना है कि सूचना देने के बावजूद चारों बेटे अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुए और मां को मुखाग्नि देने से भी इनकार कर दिया
पहाड़ का सच/एजेंसी
देहरादून। चार बेटों के बावजूद मां का अंतिम संस्कार एक समाजसेवी संस्था ने किया। इस बेसहारा महिला की 8 महीने इंदौर के वृद्धाश्रम में देखभाल हुई थी। वृद्धा की अंत्येष्टि की खबर सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो रही है।
ये खबर मध्य प्रदेश के इंदौर जिले की है। खबर ऐसी है कि जिस मां ने अपने बच्चों को पालने के लिए पूरी जिंदगी खपा दी, उसी मां की अंतिम यात्रा में जब चारों बेटों का साथ नहीं मिला तो इंसानियत का एक अलग और हैरान करने वाला चेहरा सामने आया। इंदौर में लता बाई की मौत के बाद उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी परिवार ने नहीं, बल्कि एक समाजसेवी संस्था ने निभाई।
मां को मुखाग्नि देने के लिए बेटे नहीं पहुंचे, लेकिन संस्था के जिन लोगों ने उनके जीवन के आखिरी आठ महीने संभाले वही उनकी अंतिम विदाई के साथी बने। इससे पहले भी ऐसी खबर सामने आई थी, जब तीन बेटियों ने ऑनलाइन 5100 रुपये भेजकर पिता का अंतिम संस्कार कराया था।
बताया जा रहा है कि सिलिकॉन सिटी की गणेश रेसिडेंसी में रहने वाली लता बाई ने अपनी जिंदगी भर की जमा पूंजी और जेवर बेचकर एक फ्लैट खरीदा था। संस्था से जुड़े लोगों के अनुसार बाद में उनके एक बेटे ने वह फ्लैट अपने नाम करवा लिया और लता बाई को घर से बाहर कर दिया। इसके बाद उम्र के उस पड़ाव में, जब उन्हें अपने बच्चों के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत थी उन्हें बेहद मुश्किल परिस्थितियों से गुजरना पड़ा।
लता बाई की स्थिति की जानकारी, जब प्रीयु फाउंडेशन के अजय नागदा को मिली तो उन्होंने उनकी मदद के लिए पहल की। मेडिकल जांच के बाद लता बाई को जानकी वृद्धाश्रम में आश्रय दिया गया। करीब आठ महीने तक वृद्धाश्रम में उनकी देखभाल होती रही। इस दौरान संस्था के लोग ही उनके लिए परिवार की तरह खड़े रहे। अचानक तबीयत बिगड़ने पर लता बाई को एमवाय अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन इलाज के दौरान उनका निधन हो गया। उनकी मौत की सूचना ॐ शांति आश्रम की ब्रह्मकुमारी ज्योति दीदी के माध्यम से बेटों तक पहुंचाई गई।
इसके बाद पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने पर प्रीयु फाउंडेशन और जानकी वृद्धाश्रम ने लता बाई की अंतिम विदाई का जिम्मा उठाया। रीजनल पार्क में पूरे सम्मान और विधि-विधान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। जिंदगी भर बच्चों के लिए जीने वाली मां को आखिरी सफर में भले ही अपनों का कंधा नहीं मिला, लेकिन समाजसेवियों ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा। लता बाई की कहानी एक ऐसा सवाल छोड़ गई है, जिसका जवाब शायद हर परिवार को अपने भीतर तलाशना होगा- रिश्ते सिर्फ खून से बनते हैं या उन्हें निभाना भी पड़ता है।

