139 वीं जयंती पर विशेष: आधुनिक भारत के शिल्पकार और शुचिता के प्रतीक ‘भारत रत्न’ पंडित गोविंद बल्लभ पंत”हिमालय जैसी अडिग निष्ठा, राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण और एक ऐसा नेतृत्व जिसने आजाद भारत की शुरुआती राह को सुगम बनाया।
दस सितंबर का दिन भारत के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि है। यह दिन है देश के महान स्वतंत्रता सेनानी, कुशल राजनेता और उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत जी की जयंती का। .आज जब हम एक आधुनिक और प्रगतिशील भारत में सांस ले रहे हैं, तब पंत की जयंती केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति के लिए उनके उच्च आदर्शों, नैतिक मूल्यों और बेमिसाल राजनीतिक क्षमता को अपने जीवन में उतारने का एक पावन संकल्प दिवस है।
आइए, उनकी जयंती के इस पावन अवसर पर उनके जीवन के उन पहलुओं को समझें। पंत का जन्म 10 सितंबर 1887 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के खूंट गांव में एक कुलीन परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित मनोरथ पंत एक अनुशासित अधिकारी थे और माता गोविंदी बाई ने उन्हें बचपन से ही रामायण, महाभारत और भारतीय संस्कृति के उच्च संस्कारों से सिंचित किया। .पिता के तबादलों के कारण उनका अधिकांश बचपन उनके नाना पंडित बद्री दत्त जोशी (जो तत्कालीन समय के प्रतिष्ठित डिप्टी कलेक्टर थे) के संरक्षण में बीता। नाना के घर के बौद्धिक, जागरूक और विधिक (कानूनी) माहौल ने बाल गोविंद के मन में समाज सुधार और न्याय के प्रति गहरी चेतना जगाई। यही कारण था कि उच्च शिक्षा के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वकालत की डिग्री लेने के बाद, उन्होंने कानून को धन कमाने का जरिया नहीं, बल्कि गरीबों को न्याय दिलाने का माध्यम बनाया।
आज का समाज जहां छोटे-छोटे व्यक्तिगत लाभ के लिए अपने सिद्धांतों को छोड़ देता है, वहीं पंत का जीवन हमें सिखाता है कि देश और राष्ट्रहित के आगे व्यक्तिगत सुख का कोई मूल्य नहीं है।काकोरी कांड (1925) के क्रांतिकारी नायकों का नि:शुल्क कानूनी बचाव करना हो, या साइमन कमीशन (1928) के विरोध में ब्रिटिश पुलिस की लाठियों के आगे सीना तानकर खड़ा होना,पंत कभी पीछे नहीं हटे।
लखनऊ में लाठीचार्ज के दौरान उन्होंने जवाहरलाल नेहरु का बचाव करते हुए पुलिस के इतने गंभीर प्रहार अपनी पीठ और गर्दन पर झेले कि उनका शरीर स्थायी रूप से प्रभावित हो गया (उनकी गर्दन में कंपन की समस्या आ गई थी)। शारीरिक अक्षमता के बावजूद देश को आजाद देखने का उनका मानसिक संकल्प अंत तक अडिग रहा। .आज के दौर में जहां राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का साधन मान लिया जाता है, वहीं पंत ने अपनी राजनीतिक क्षमता से यह सिद्ध किया कि राजनीति वास्तव में ‘जनकल्याण का माध्यम’ है। उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री (1947-1954) के रूप में उनका सबसे ऐतिहासिक कार्य जमींदारी प्रथा का खात्मा था। उन्होंने बिना किसी सामाजिक टकराव के इतने बड़े भूमि सुधार को लागू किया, जिसने लाखों भूमिहीन गरीब किसानों को उनका हक और स्वाभिमान दिलाया।
.वर्ष 1955 में सरदार पटेल के बाद जब उन्होंने देश के केंद्रीय गृह मंत्री का पद संभाला, तब देश के सामने राज्यों के भाषाई पुनर्गठन की भारी चुनौती थी। उन्होंने अपनी अद्भुत राजनीतिक सूझबूझ, धैर्य और संवाद क्षमता से देश को बिना किसी बड़ी अशांति के एकजुट रखा। पंत का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसकी भाषा में बसती है। भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा का आधिकारिक दर्जा दिलाने और प्रशासनिक कार्यों में उसे स्थान दिलाने के लिए संसदीय समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने जो ऐतिहासिक प्रयास किए, उसके लिए देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा।
उनकी इसी निस्वार्थ देशभक्ति, सत्यनिष्ठा और अद्वितीय प्रशासनिक क्षमता के कारण वर्ष 1957 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। 7 मार्च 1961 को जब इस महान विभूति ने अंतिम सांस ली, तो देश ने एक ऐसा नेता खो दिया जिसने सत्ता में रहते हुए भी साधु जैसा सादगीपूर्ण जीवन जिया। (पहाड़ का सच परिवार की तरफ से देश के महान राजनेता को कोटि-कोटि नमन. हरीश जोशी, अशोक डंडरियाल,संजीव सुयाल)

