– पूर्व मंत्री डा.हरक सिंह रावत के ताजा बयान (भाजपा,कांग्रेस में कई चेले) से छिड़ सकती है नई चर्चा
– दबदबा जताने की कोशिश, लक्ष्मण रेखा में बंधने की आशंका
– डॉ.हरक की सक्रियता से देहरादून की तीन विधानसभा सीटों में पार्टी के भीतर हो सकती है उथल पुथल
– साल 2022 में बड़ी मशक्कत के बाद कांग्रेस में वापसी हुई जरूर,पर टिकट नहीं मिला
हरीश जोशी/पहाड़ का सच देहरादून। उत्तराखंड के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत का “मेरे चेले आज मंत्री और मुख्यमंत्री बन गए हैं, कांग्रेस हो या भाजपा दोनों में ही मेरे कई करीबी आदमी हैं” वाला बयान राज्य की राजनीति में उनके दबदबे और अनुभव को दर्शाने की कोशिश है। विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और टिकटों के वितरण में सक्रिय भागीदारी भी हरक की राजनीति का एक अहम हिस्सा हो सकता है। उनके इस तरह के बयानों की अनवरत श्रृंखला ये दर्शाती है कि हरक सिंह टिकिट वितरण तक कांग्रेस में अपना पलड़ा भारी रखना चाहते हैं।
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भाजपा, कांग्रेस में सभी चेले हैं, इस बयान के जरिए हरक सिंह रावत ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वे उत्तराखंड की राजनीति के सबसे पुराने और अनुभवी खिलाड़ियों में से एक हैं, जिनका राजनीतिक सफर उत्तर प्रदेश के समय से रहा है। उन्होंने खुद को एक ऐसे धुरंधर के रूप में पेश किया है जिसके साथ कई बड़े नेताओं का राजनीतिक इतिहास जुड़ा है। यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि हरक सिंह रावत के संबंध सिर्फ कांग्रेस तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सत्तारूढ़ दल के कई शीर्ष नेता और मंत्री भी उनके पुराने राजनीतिक सहयोगी या उनके प्रभाव क्षेत्र से रहे हैं।
इससे राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि पर्दे के पीछे उनका संपर्क दोनों दलों के बड़े नेताओं के साथ है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए हरक सिंह रावत इस प्रकार के बयानों से पार्टी के भीतर और बाहर अपना महत्व बनाए रखना चाहते हैं। वे हाईकमान और अन्य नेताओं को यह जताना चाहते हैं कि चुनावी प्रबंधन और टिकट पर बंटवारे या राजनीतिक रणनीति में उनकी उपेक्षा करना आसान नहीं होगा।
डा.रावत के इस बयान से जहां उनके समर्थक उनके राजनीतिक कौशल की तारीफ कर रहे हैं, वहीं भाजपा और अन्य विरोधी दलों को उन पर कटाक्ष करने का मौका मिल गया है। इससे उत्तराखंड की सियासत में एक नई बयानबाजी शुरू हो गई है, जिससे कांग्रेस के भीतर भी राजनीतिक समीकरणों पर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
लगातार चर्चा में रहे उनके बयानों का निहितार्थ ये निकाला जा रहा है कि हरक के मन में आगामी विधानसभा चुनाव में अपने और अपने करीबियों के टिकट को लेकर संशय और चिंताएं स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही हैं। वे खुद को एक मजबूत नेता के रूप में पेश जरूर कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के भीतर बदले हुए नियम, उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक परिस्थितियां और करीबियों का साथ छूटना उनके इस संशय को गहरा करता है।
असल में कांग्रेस पार्टी चुनाव में एक परिवार, एक टिकट के सिद्धांत पर काफी सख्ती से विचार कर रही है। हरक सिंह रावत हमेशा से अपने साथ-साथ अपने परिवार या बेहद करीबियों के लिए भी टिकट की पैरवी करते रहे हैं. इस नियम के कारण वे अपने और अपने किसी रिश्तेदार या करीबी के लिए एक साथ टिकट हासिल करने को लेकर भारी संशय में हैं।
हरक सिंह हर चुनाव में अपनी विधानसभा सीट बदलने के लिए जाने जाते हैं वे पौड़ी, रुद्रप्रयाग, लैंसडाउन और कोटद्वार से चुनाव लड़ चुके हैं। इस बार वे सहसपुर,डोईवाला, धर्मपुर जैसी मैदानी/सुरक्षित सीटों से चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि पहाड़ की सीटों पर उनके लिए मुकाबला कड़ा हो सकता है।
हालांकि, पार्टी हाईकमान ने अभी तक उनकी मनपसंद सीट पर कोई अंतिम हामी नहीं भरी है, जिससे उनका संशय बरकरार है। हरक सिंह ने हाल ही में बयान दिया था कि टिकट केवल जीतने की क्षमता के आधार पर मिलेगा, चाहे कोई राहुल गांधी की सिफारिश ही क्यों न ले आए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के सख्त बयान देकर हरक सिंह रावत दरअसल पार्टी के भीतर अपने विरोधी गुटों पर दबाव बनाना चाहते हैं, ताकि टिकट वितरण में उनकी उपेक्षा न की जा सके।
कांग्रेस के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और अन्य वरिष्ठ नेता जैसे प्रीतम सिंह और गणेश गोदियाल भी अपने-अपने क्षेत्रों और समर्थकों को मजबूत करने में लगे हैं। हरक सिंह को डर है कि कहीं पार्टी उन्हें सिर्फ चुनाव प्रबंधन समिति का अध्यक्ष बनाकर संगठन के काम में न समेट दे और उनके करीबियों के टिकट काट दिए जाएं। यही वजह है कि वे सब मेरे चेले हैं” जैसे बयान देकर लगातार अपनी राजनीतिक उपयोगिता और धमक साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि टिकट तय होने तक उनका पलड़ा भारी रहे।

