– नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने पूछा- अपने संसाधन छोड़ अडानी से महंगी बिजली क्यों?
– संसाधन हमारे और फायदा निजी कंपनियों को क्यों दिया जा रहा है ?
– भाजपा अध्यक्ष भट्ट ने कहा, कांग्रेस सरकार के बिजली खरीद में हुई लूट, धामी सरकार दे रही सस्ती बिजली
– अडानी एनर्जी सॉल्यूशंस के स्मार्ट मीटर का भी कांग्रेस ने किया था तीखा विरोध
पहाड़ का सच देहरादून। अडानी पावर लिमिटेड से पहले स्मार्ट मीटर और अब बिजली खरीद के कैबिनेट फैसले के विरोध में कांग्रेस मुखर हो गई है। नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य से कैबिनेट फैसले पर सवाल उठाए हैं जबकि भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने दावा किया है कि धामी सरकार में लोगों को सस्ती बिजली मिल रही है। भट्ट ने आरोप लगाया कि कांग्रेस राज में बिजली खरीद में भारी लूट हुई है।

नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि अपने संसाधन छोड़ अडानी से महंगी बिजली क्यों खरीदी जा रही है। उन्होंने कहा कि जल-जंगल-जमीन उत्तराखंड की है और फायदा निजी कंपनियों को दिया जा रहा है। आर्य ने धामी कैबिनेट के हालिया फैसले पर गंभीर सवाल उठाये हैं, उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के संसाधनों का लाभ प्रदेश की जनता को मिलना चाहिए, निजी कंपनियों को नहीं।
आर्य ने उत्तराखंड की धामी सरकार द्वारा अडानी पावर से 25 वर्षों तक 1,320 मेगावाट बिजली खरीदने के कैबिनेट फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे उत्तराखंड के हितों से जुड़ा गंभीर सवाल बताया है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उत्तराखंड की नदियां, जल और प्राकृतिक संसाधन यहां की जनता की धरोहर हैं। जिस प्रदेश की पहचान जलविद्युत और प्राकृतिक ऊर्जा संसाधनों से है, उसी प्रदेश को 25 वर्षों के लिए निजी कंपनी से कोयला आधारित बिजली खरीदने के लिए बाध्य होना सरकार की ऊर्जा नीति पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

उन्होंने कहा कि धामी सरकार को प्रदेश की जनता को यह बताना चाहिए कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि 25 साल के लिए अदाणी पावर से ₹5.746 प्रति यूनिट की दर पर 1,320 मेगावाट बिजली खरीदने का फैसला करना पड़ा?
यशपाल आर्य ने कहा कि 25 वर्षों की अवधि वाला बिजली खरीद समझौता कोई सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं है। यह प्रदेश की आने वाली कई पीढ़ियों पर आर्थिक प्रभाव डालने वाला फैसला है।
उन्होंने कहा कि सरकार को सार्वजनिक रूप से यह बताना चाहिए कि इस करार के तहत 25 वर्षों में उत्तराखंड पर कुल कितनी वित्तीय देनदारी आएगी, टैरिफ में भविष्य में किस प्रकार के संशोधन होंगे, बिजली की वास्तविक आपूर्ति लागत क्या होगी और इस समझौते में प्रदेश के हितों की रक्षा के लिए कौन-कौन सी शर्तें रखी गई हैं।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उत्तराखंड ने देश को बिजली देने के लिए अपनी नदियों, पहाड़ों और पर्यावरण की बड़ी कीमत चुकाई है। बड़े बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं के कारण हजारों परिवारों का विस्थापन हुआ, पर्यावरणीय प्रभाव झेला गया और उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा का उपयोग राष्ट्रीय ऊर्जा जरूरतों के लिए किया गया।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब नदियां हमारी हैं, जल हमारा है, पहाड़ हमारे हैं, तो उत्तराखंड की ऊर्जा नीति का लाभ उत्तराखंड की जनता को क्यों नहीं मिलना चाहिए? उन्होंने कहा कि सरकार को पहले यह जवाब देना चाहिए कि प्रदेश की अपनी जलविद्युत क्षमता का पूरा उपयोग क्यों नहीं हो पा रहा है और राज्य को लगातार बाहर से बिजली खरीदने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
आर्य ने कहा कि आज पूरी दुनिया स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे समय में उत्तराखंड जैसे पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील राज्य के लिए 25 वर्षों तक कोयला आधारित बिजली पर निर्भरता की नीति पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड के पास जलविद्युत के साथ-साथ सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य अक्षय ऊर्जा स्रोतों की भी संभावनाएं हैं। सरकार को यह बताना चाहिए कि इन विकल्पों को प्राथमिकता देने के बजाय इतने लंबे समय के लिए कोयला आधारित बिजली खरीदने का निर्णय क्यों लिया गया।
नेता प्रतिपक्ष ने मांग की कि सरकार इस पूरे बिजली खरीद समझौते को पारदर्शी तरीके से जनता के सामने रखे और निम्न सवालों का जवाब दे।
25 वर्षों में इस समझौते की अनुमानित कुल वित्तीय लागत कितनी होगी?
₹5.746 प्रति यूनिट की दर में कौन-कौन से शुल्क और समायोजन शामिल हैं?
क्या भविष्य में इस दर में वृद्धि या अन्य वित्तीय भार की संभावना है?
करार समाप्त करने अथवा पुनरीक्षण की क्या शर्तें हैं?
उत्तराखंड की अपनी जलविद्युत क्षमता का वर्तमान उपयोग कितना है?
राज्य को प्रतिवर्ष कितनी बिजली बाहर से खरीदनी पड़ती है?
क्या राज्य की अपनी जलविद्युत और अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं से भविष्य की मांग पूरी करने का विस्तृत रोडमैप तैयार किया गया है?
कोयला आधारित बिजली खरीद के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किस आधार पर किया गया है?
इस करार से उत्तराखंड के उपभोक्ताओं और राज्य के खजाने पर वास्तविक प्रभाव क्या पड़ेगा?
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उत्तराखंड के पास देश को ऊर्जा देने की क्षमता है। लेकिन विडंबना यह है कि प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद प्रदेश को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए बाहर से बिजली खरीदनी पड़ रही है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि धामी सरकार को अडानी पावर के साथ 25 साल के इस करार पर प्रदेश की जनता को पूरा सच और पूरा हिसाब देना होगा। सरकार जवाब दे कि 25 साल तक अदाणी से बिजली खरीदने की जरूरत क्यों पड़ी और इसकी वास्तविक कीमत उत्तराखंड की जनता कितनी चुकाएगी?
इसके अलावा, जिस कोयला ब्लॉक से अडानी कोयला निकालेगा, वह राज्य सरकार की संपत्ति है। इस कोयला ब्लॉक का आवंटन पिछले वर्ष राज्य सरकार को किया गया था। यानी, कोयला भी हमारा, उसका इस्तेमाल करके बिजली भी हमसे ही खरीदी जाएगी और आखिर में उसी बिजली को हमें ही बेचा जाएगा।

कांग्रेस की तुलना में धामी सरकार ने किया सस्ती बिजली का किया इंतजाम: भट्ट
कांग्रेस ने 11.26 रुपए, भाजपा ने किया 5.74 रुपए प्रति यूनिट का करार
अडाणी पावर के साथ 1320 मेगावाट थर्मल पावर के करार पर विपक्ष के उठाए सवालों पर भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस सरकार में 2016 में हुए महंगे गैस पावर सौदे की याद दिलाते हुए कहा कि कांग्रेस के करार के कारण आज गैस पावर का 11.26 रुपए प्रति यूनिट की दर से भुगतान करना पड़ता है। इसमें कई बार बिना बिजली का उत्पादन हुए भी फिक्स चार्ज का करोड़ों का हर महीने अलग भुगतान करना होता है। वहीं भाजपा ने 5.74 रुपए प्रति यूनिट का थर्मल पावर का करार अगले 25 साल के लिए किया है।
महेंद्र भट्ट कहा कि कांग्रेस राज में पावर सेक्टर में सिर्फ लूट हुई, जबकि धामी सरकार में 25 साल के लिए न सिर्फ सस्ती बिजली का इंतजाम हुआ, बल्कि उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने को असल मायनों में काम हुए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस राज में काशीपुर के गैस पावर प्लांटों से 11.26 रुपए प्रति यूनिट की दर से महंगी बिजली का करार हुआ, जो आज तक राज्य के लिए मुसीबत बना हुआ है। बाजार में गैस के दाम महंगे होने पर इन पावर प्लांट को चलाना मुश्किल होता है। इसके बावजूद उन्हें हर महीने फिक्स चार्ज का करोड़ों का भुगतान करना होता है।
कांग्रेस के करार के कारण आज राज्य को 11.26 रुपए प्रति यूनिट की दर से करार किया, वहीं भाजपा की धामी सरकार ने सबसे विश्वसनीय मानी जानी वाली थर्मल पावर का करार सिर्फ 5.74 रुपए प्रति यूनिट में किया। .इसमें यदि ट्रांसमिशन चार्ज भी जोड़ दिए जाएं, तो भी ये कीमत छह रुपए से अधिक नहीं है। सरकार के इस कदम से उत्तराखंड ने अपनी भविष्य की बिजली जरूरतों को भी सुरक्षित किया है। ये करार अभी तक देश में हुए थर्मल पावर के सभी करारों में सबसे सस्ता करार है।
भट्ट ने कहा कि कांग्रेस नेताओं को अपनी जानकारी दुरुस्त करनी चाहिए। अडानी पावर को फ्री में कोल ब्लॉक नहीं मिला है। केंद्र सरकार के उत्तराखंड को आवंटित कोल ब्लॉक का इस्तेमाल बिजली उत्पादन में होगा। केंद्र सरकार को इस कोल ब्लॉक का भुगतान होगा। इससे पैदा होने वाली बिजली उत्तराखंड को सस्ती दरों पर मिलेगी। यदि यह पावर प्लांट उत्तराखंड में लगाया जाता तो छत्तीसगढ़ से कोयला उत्तराखंड लाने में कोयला परिवहन का खर्चा बढ़ जाता । धामी सरकार ने स्मार्ट निर्णय लिया और सस्ती बिजली का इंतजाम किया।
भट्ट ने कहा कि मानसून, आपदा के दौरान सोलर और हाइड्रो से बिजली उत्पादन प्रभावित होता है। युद्ध के समय गैस विदेशों से आना बंद हो जाती है। उस दौरान गैस महंगी होने के कारण गैस पावर चल नहीं पाते। ऐसे में थर्मल पावर को सबसे विश्वसनीय बिजली माना जाता है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अपनी सरकार के समय की बिजली कटौती याद रखनी चाहिए। किस तरह 10 घंटे से अधिक बिजली कटौती होती थी। आज धामी सरकार में 24 घंटे बिजली की सप्लाई हो रही है। किसानों को सस्ती बिजली मिल रही है।
भट्ट ने कहा कि कांग्रेस ने अपने शासन में कभी भी उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश बनाने की दिशा में कोई काम नहीं किया। जबकि धामी सरकार ने न सिर्फ पुराने रुकी हुई परियोजनाओं पर काम शुरू किया, बल्कि ऊर्जा के हर क्षेत्र में बिजली उत्पादन बढ़ाने को जमीनी काम किया। आज उत्तराखंड में एक हजार मेगावाट से अधिक सोलर पावर उत्पादन हो रहा है। जो कांग्रेस राज में सिर्फ एक सपना था। दशकों से रुकी हुई लघु जल विद्युत परियोजनाओं का पारदर्शी तरीके से आवंटन कर काम शुरू कराया।
भट्ट ने कहा कि 300 मेगावाट की लखवाड़, 660 मेगावाट किसाऊ, त्यूणी प्लासू, सरकारी भ्योल रसियाबगड़ जैसे बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा कर एक हजार मेगावाट बिजली उत्पादन के रास्ते तैयार किए। वहीं स्मॉल हाइड्रो, सोलर पावर, जियो थर्मल, पंप स्टोरेज पावर प्लांट से आने वाले सालों में उत्तराखंड पावर सेक्टर में देश के अग्रणी राज्यों में खड़ा होगा।
इन योजनाओं से उत्तराखंड सिर्फ अपनी बिजली जरूरतों को ही पूरा नहीं करेगा, बल्कि देश की बिजली जरूरतों को पूरा करने में भी सहयोग देगा। इससे आने वाले वर्षों में बिजली उत्पादन राज्य के राजस्व का सबसे बड़ा जरिया बनेगा। लाखों की संख्या में रोजगार, स्वरोजगार बढ़ेगा। इन बिजली योजनाओं से मिलने वाले लोकल एरिया डेवपलमेंट फंड से राज्य के दुरुस्थ और परियोजना क्षेत्रों में विकास कार्य होंगे।

