
राज्य में विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए 46,203.76 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई है
आरटीआई एक्टिविस्ट अनूप नौटियाल ने जारी किए ये आंकड़े
पहाड़ का सच देहरादून। राज्य गठन के बाद से अब तक यानी 25 सालों में विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए 46,203.76 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई है। सूचना के अधिकार (RTI) से मिली जानकारी में खुलासा हुआ है कि सबसे ज्यादा वन भूमि जल विद्युत परियोजनाओं, सड़क निर्माण और खनन गतिविधियों के लिए दी गई है। वहीं, कुल हस्तांतरित वन भूमि में अकेले देहरादून जिले की हिस्सेदारी करीब 47 फीसद है।

राज्य गठन के बाद विकास परियोजनाओं को दी गई 46 हजार हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि .वन संरक्षण निदेशालय से आरटीआई के तहत मिली जानकारी के मुताबिक, 9 नवंबर 2000 को राज्य गठन से लेकर जून 2026 तक प्रदेश में कुल 46,203.76 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की गई है। आंकड़ों के मुताबिक, सबसे ज्यादा 22,50.08 हेक्टेयर वन भूमि जल विद्युत परियोजनाओं के लिए दी गई।

समाजसेवी अनूप नौटियाल के अनुसार सड़क निर्माण के लिए 10,070.03 हेक्टेयर, खनन कार्यों के लिए 9,289.81 हेक्टेयर, पारेषण (हाई वोल्टेज) लाइनों के लिए 3,005.51 हेक्टेयर, सिंचाई परियोजनाओं के लिए 456.18 हेक्टेयर और पेयजल योजनाओं के लिए 294.56 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई. इसके अलावा अन्य परियोजनाओं के लिए भी 2,837.60 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग की गई। आरटीआई आंकड़े बताते हैं कि राज्य गठन के बाद विकास परियोजनाओं की बढ़ती जरूरतों के साथ वन भूमि के उपयोग में लगातार वृद्धि हुई है। विशेष रूप से जल विद्युत परियोजनाएं और सड़क निर्माण वन भूमि हस्तांतरण के सबसे बड़े कारण बनकर उभरे हैं।

देहरादून में सबसे अधिक वन भूमि हस्तांतरण .जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो सबसे ज्यादा वन भूमि देहरादून जिले में हस्तांतरित की गई है. देहरादून में 21,618.32 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न परियोजनाओं के लिए दी गई. इसके बाद हरिद्वार में 6,002.32 हेक्टेयर, नैनीताल में 3,603.83 हेक्टेयर, चमोली में 3,065.34 हेक्टेयर, टिहरी में 2,555.29 हेक्टेयर और पिथौरागढ़ में 2,360.67 हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित की गई ,उत्तरकाशी में 1,389.83 हेक्टेयर, पौड़ी में 1,344.30 हेक्टेयर, अल्मोड़ा में 1,266.62 हेक्टेयर, चंपावत में 1,046.55 हेक्टेयर, रुद्रप्रयाग में 852.78 हेक्टेयर, बागेश्वर में 326.23 हेक्टेयर और उधम सिंह नगर में 271.09 हेक्टेयर वन भूमि विकास कार्यों के लिए हस्तांतरित हुई।

विकास कार्यों के लिए हस्तांतरित वन भूमि
आंकड़ों से स्पष्ट है कि राजधानी देहरादून और उसके आसपास के क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं का दबाव सबसे ज्यादा रहा है. कुल हस्तांतरित वन भूमि का करीब आधा हिस्सा अकेले देहरादून जिले से संबंधित है. यानी दून घाटी में पेड़ों से भरे वन भूमि को हस्तांतरित की गई है. जाहिर है इससे हजारों पेड़ों पर आरियां चली होंगी.
हर दिन 250 नाली जंगल विकास के नाम पर कट रहा .आरटीआई आवेदक और समाजसेवी अनूप नौटियाल ने एक टीवी चैनल में कहा कि उत्तराखंड के 25 सालों के विकास मॉडल पर गंभीर चर्चा की जरूरत है. आज प्रदेश में पर्यटन और यातायात सुविधाओं को विकास की प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन इसके बदले प्राकृतिक संसाधनों एको भारी कीमत चुकानी पड़ .यदि इस आंकड़े को औसत के रूप में देखा जाए, तो लगभग 5 हेक्टेयर यानी करीब 250 नाली जंगल प्रतिदिन किसी न किसी परियोजना के लिए वन क्षेत्र से बाहर किया जा रहा है.
“यह प्रक्रिया जल विद्युत परियोजनाओं, सड़क निर्माण, खनन और अन्य विकास कार्यों के नाम पर लगातार जारी है. पर्यटन आधारित विकास के चलते जंगलों, जल स्रोतों और वन्यजीव आवासों पर दबाव बढ़ा है. इसके परिणाम भी अब सामने दिखाई देने लगे हैं.
नौटियाल का कहना है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है. साल 2026 में अब तक 36 लोगों की मौत मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में हो चुकी है. यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि प्रदेश की पारिस्थितिकी और भविष्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
उन्होंने कहा कि सबसे चिंताजनक तथ्य ये है कि देहरादून जिला राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का केवल लगभग 6 प्रतिशत हिस्सा रखता है, लेकिन पिछले 25 सालों में विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित कुल वन भूमि में उसकी हिस्सेदारी करीब 47 फीसदी है. उनके अनुसार यह असंतुलन बताता है कि विकास का दबाव किन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा पड़ा है.
इसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों पर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड को विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने वाला मॉडल अपनाने की जरूरत है। ताकि, भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सके।

