
28 अप्रैल से 25 मई तक राज्य के सभी जिलों के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों तक पहुंचेगी डोल

देव संस्कृति व लोक संस्कृति की रक्षा हो: मंत्री प्रसाद नैथानी
पहाड़ का सच देहरादून। उत्तराखण्ड पूरे विश्व में देवभूमि के नाम से ख्याति प्राप्त है। यहां 13 जनपदों में विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के शक्तिपीठ हैं। मुख्य रूप से हिन्दुओं के विश्व प्रसिद्ध धाम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ तथा सिक्खों के हेमकुण्ड साहिब, नानकमत्ता, रीठा साहिव एवं मुस्लिमों के पीरान कलियर, ईसाइयों के देहरादून एवं नैनीताल के चर्च तथा जैन एवं बौद्ध सम्प्रदायों के तीर्थ हैं।

बाबा विश्वनाथ जगदीशिला डोली 27 वीं देव दर्शन यात्रा के संयोजक व पूर्व मंत्री ,मंत्री प्रसाद नैथानी ने रविवार को पत्रकारों से बातचीत में यात्रा के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में बहुत सारे ऐसे शक्तिपीठ हैं जिनके बारे में लोगों को पता नहीं है। इस संदर्भ में 25 वर्ष पूर्व मुझे स्वप्न में कोई साधू आकर के यह कहते थे कि मुझे भ्रमण कराओ। स्वप्न के पश्चात् 3-4 दिन तक मैं बहुत हो विचलित रहता था। अंत में मैंने अपनी मां स्व भूमा देवी से इस बारे में बात की तो मां ने मुझे कहा कि तुम विशोन पर्वत जाओ जो मेरे गांव कोट से 10 किमी की ऊँचाई पर पट्टी ग्यारह गांव हिंदाव में स्थित है।

मैं 28 जनवरी 1998 को प्रातः 4 बजे अपने गांव से अकेले चलकर विशोन पर्वत (जिसका वर्णन केदारखण्ड में है तथा भगवान राम के गुरु वशिष्ठ जी एवं व्यवहारिक वेदान्त के धनी स्वामी रामतीर्थ जी ने यहां तपस्या की) पहुंचा। वहां बर्फ पड़ी थी उसे साफ कर कुण्ड में स्नान कर शिवलिंग के सामने ध्यान लगाया। जब मेरी आंखे खुली तो शिवलिंग पर इस डोली का विम्ब प्रकट होते दिखा जो मात्र 1 सेकेण्ड की घटना थी। तब मैंने महसूस किया कि यही बाबा है जो घूमना चाहते हैं। तत्पश्चात् डोली का निर्माण किया गया एवं विश्वनाथ-जगदीशिला तीर्थाटन समिति का गठन किया गया।
जो लगातार विगत 25 वर्षों से इस डोली यात्रा के कार्यक्रम को चलाते आ रहे हैं। जगदीशिला हिन्दाव पट्टी में शक्तिपीठ के रूप में पूजी जाती है। डोली के अन्दर शिव और शक्ति की मूर्तियां प्राण प्रतिष्ठा सहित स्थापित रहती है। इस प्रकार डोली ने गंगा दशहरा विशोन पर्वत पर मनाने का आदेश दिया। यह डोली बोली बोलती है, चिन्ह लगाती है। डोली ने प्रथम तीन वर्ष सन् 2000 से 2003 तक पट्टी हिन्दाव एवं ग्यारह गांव के 60 गांव में पैदल भ्रमण प्रतिवर्ष गंगा दशहरा के 15 दिन पूर्व घनसाली में नैलचामीगाड एवं भिलंगना नदी के संगम से यात्रा प्रारम्भ कर गंगा दशहरा को समापन किया।
2003 से 2006 तक डोली ने हरिद्वार से विशोन पर्वत पर पूर्व स्थानों से होकर गंगा दशहरा पर्व विशोन पर्वत पर मनाया एवं लोगों को आशीर्वाद दिया। सन् 2006 से 2011 तक डोली ने गढ़वाल मंडल भ्रमण का कार्यक्रम करने का एवं प्रतिवर्ष गंगा दशहरा मनाने का आदेश दिया। इस प्रकार डोली ने 12 वर्षों का प्रथम चरण पूर्ण किया। सन् 2011 में पहली बार डोली ने चार धामों यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ एवं बदरीनाथ के दर्शन कर भक्तगणों को आशीर्वाद दिया। 12 वर्ष की यात्रा के मापन पर हमने डौली से प्रार्थना की कि अब आप अपने धाम विशोन पर्वत पर विराजमान थे किन्तु डोली ने स्वीकार नहीं किया तथा पूरे उसखण्ड भ्रमण का निर्णय दिया।
वर्ष 2012 से और आज तक यात्रा पूरे उत्तराखण्ड व साढ़े दस हजार किलोमीटर एवं 2200 देवालयों का दर्शन लाखों लोगों को अपना आशीर्वाद देते हुए गंगा दशहरा पर्व विशोन पर्वत पर मनाते आ रहे हैं। यहां पर यह उल्लेख करना जरूरी है कि डोली अब तक 26 वर्षों के भ्रमण कर 432 देवाला को चिन्हित कर चुकी है। डोली बोली बोलती है। संतान प्राप्त के साथ-साथ धन एवं ऐश्वर्य प्राप्ति, यश प्राप्ति तथा जिस स्थान पर डोली बैठती है या विश्राम करती है उस स्थान का या उस इलाके के भक्तगणों का जो इसकी यात्रा में सम्मिलित होते हैं उनकी एक साल के अन्दर मनोकामना सुनिश्चित पूर्ण करती है।
पूरे उत्तराखण्ड में बहुत से भक्तगण इसके दिये हुए आशीर्वाद से अपना जीवन सुखमय तरीके से यापन कर रहे है।इस डोली यात्रा में प्रतिवर्ष विभिन्न स्थानों पर साधू-संत, ज्ञानी एवं श्रद्धालु, मुख्यमंत्री एवं मत्रीगण, विधायकगण, महापौर, ब्लॉक प्रमुख, जिला पंचायत नगरपालिका अध्यक्षगण, प्रधान एवं क्षेत्र पंचायतगण, अधिकारी एवं कर्मचारी गण तथा सभी धर्मों के लोग सम्मिलित होकर यात्रा को सफल बनाने में सहयोग देते हैं।
यह डोली यात्रा विशुद्ध रूप से देव यात्रा है इसमें केवल देवी एवं देवताओं का ही अवतरण पश्वा (डंगरिया) लोगों पर होता है तथा सभी मिलकर भक्तगणों को आशीर्वाद एवं दर्शन देते है यह डोली यात्रा विश्व की पहली डोली यात्रा है जो संपूर्ण जगत की खुशहाली एवं शांति के लिए प्रतिवर्ष गंगा दशहरा के 30 दिन पूर्व विशोन पर्वत से चलकर पूरे उत्तराखण्ड की 10,500 किमी की दूरी एवं देवालयों की परिक्रमा कर अपने भक्तगणों की मनोकामना पूरी करने का आशीर्वाद देकर पुनः विशोन पर्वत पर ही अपनी यात्रा को विराम देती है।
