
– 31 मार्च को रिटायर्ड हुए स्कूल में पढ़ा रहे एक मात्र गुरुजी,1 अप्रैल से मास्टर विहीन विद्यालय
– डीएलएड प्रशिक्षु तीन महीने से कभी शिक्षा मंत्री तो कभी शिक्षा निदेशालय के काट रहे हैं चक्कर
पहाड़ का सच, रामनगर।
रामनगर विकासखंड के ग्राम रामपुर स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय में शिक्षकों की कमी ने छात्रों के भविष्य को लेकर चिंता में डाल दिया है। छात्र और अभिभावक स्कूल में तालाबंदी कर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं।
जानकारी के अनुसार रामपुर के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में 43 बच्चे पढ़ते हैं। लंबे समय से यहां सिर्फ एक शिक्षक, मोहनचंद जोशी पढ़ा रहे थे। जोशी जी 31 मार्च को रिटायर हो गए। लेकिन शिक्षा विभाग ने अभी तक यहां किसी भी स्थायी शिक्षक की नियुक्ति नहीं की है। फिलहाल, अन्य स्कूलों से एक-एक शिक्षक को अस्थायी रूप से यहां पढ़ाने के लिए भेजा जा रहा है। इससे न केवल इस स्कूल के बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही, बल्कि जिन स्कूलों से शिक्षक बुलाए जा रहे हैं, वहां भी शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा है।
अपनी शिक्षा के प्रति बच्चों ने भी गंभीरता दिखाई और नारे लगाते हुए कहा, “हमें मास्टर चाहिए, हम पढ़ना चाहते हैं.” बच्चों का कहना था कि वे पढ़ाई में पीछे नहीं रहना चाहते, लेकिन नियमित शिक्षक के बिना उनकी पढ़ाई अधूरी रह जाती है। बच्चों और अभिभावकों का कहना है कि अन्य स्कूलों से अलग-अलग शिक्षक आने से पढ़ाई की निरंतरता टूट रही है, जिससे उनकी शिक्षा पर बुरा असर पड़ रहा है। बच्चों का भविष्य दांव पर लगते देख अभिभावकों और स्थानीय नेताओं ने विरोध प्रदर्शन किया और स्थायी शिक्षक की नियुक्ति की मांग की।
पूर्व ब्लॉक प्रमुख संजय नेगी ने भी मौके पर पहुंचकर प्रदर्शन कर रहे अभिभावकों और बच्चों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलनी चाहिए. लेकिन सरकार की अवसंरचना और संसाधन प्रबंधन की कमी के कारण बच्चों का भविष्य अंधकार में जा रहा है। उन्होंने सरकार से शीघ्र शिक्षक नियुक्ति की मांग की। चेतावनी दी कि यदि जल्द कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो उग्र आंदोलन किया जाएगा।
वहीं उत्तराखंड सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं को हर गांव तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन इस मामले ने सरकार के दावों की पोल खोल दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी शिक्षकों की भारी कमी है, जबकि डीएलएड प्रशिक्षु तीन महीने से कभी शिक्षा मंत्री तो कभी शिक्षा निदेशालय के चक्कर काट रहे हैं।
