
पहाड़ का सच/एजेंसी।

मुम्बई। भारतीय संगीत की बहुमुखी आवाज़ से दशकों तक श्रोताओं के दिलों पर राज करने वाली महान पार्श्वगायिका आशा भोसले अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनके निधन के साथ ही भारतीय सिनेमा का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया है।
8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मीं आशा जी संगीत के माहौल में पली-बढ़ीं। उनके पिता दीनानाथ मंगलेशकर एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे। मात्र 9 वर्ष की उम्र में पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। अपनी बड़ी बहन लता के साथ उन्होंने बहुत कम उम्र में ही गायन शुरू कर दिया और संघर्षों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।
आशा भोसले ने 1948 में फिल्मों में पार्श्वगायन की शुरुआत की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने शास्त्रीय, ग़ज़ल, पॉप, कैबरे और लोक संगीत—हर शैली में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा। ‘दम मारो दम’ और ‘पिया तू अब तो आजा’ जैसे गीत आज भी उनके जीवंत अंदाज़ की मिसाल हैं। संगीतकार आर डी बरमन के साथ उनकी जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई अमर गीत दिए।
आशा जी ने अपने करियर में 20 से अधिक भाषाओं में 12,000 से ज्यादा गाने गाए। उन्हें वर्ष 2000 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और 2008 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उन्होंने 9 बार फिल्मफेयर पुरस्कार जीता और गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी अपना नाम दर्ज कराया। उनके निधन की खबर से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई है। संगीत प्रेमी, कलाकार और फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज उन्हें नम आंखों से याद कर रहे हैं।
आशा भोसले सिर्फ एक गायिका नहीं थीं, बल्कि एकता युग थीं—एक ऐसी आवाज़, जो हर पीढ़ी के दिल में हमेशा जिंदा रहेगी। उनकी मधुर धुनें आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करती रहेंगी।
