
पहाड़ का सच देहरादून। श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ में
श्रीकृष्ण और गोपियों की रास लीला पर प्रवचन देते हुए व्यास आचार्य बद्री प्रसाद बडोनी ने कहा कि भक्ति योग की सर्वोच्च पराकाष्ठा है। श्रीकृष्ण गोपियों की रास लीला केवल नृत्य नहीं, बल्कि जीवात्मा (गोपी) का परमात्मा (कृष्ण) से मिलन है। इसमें काम (इच्छा) नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और आत्मनिवेदन का भाव है, जहां भक्त अपना अस्तित्व ईश्वर में विलीन कर देता है।


डॉक्टर विजया नन्द काला, नीलम काला, शिवानी काला, शिवांगन
गंगा एनक्लेव लेन नंबर दो दून यूनिवर्सिटी रोड,अजबपुर देहरादून द्वारा पितरों के निमित्त आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन रास लीला में भक्ति योग पर बोलते हुए व्यास आचार्य बडोनी ने कहा कि गोपिया स्वयं को और कृष्ण को एक मानती थीं, जो अद्वैत भक्ति का उच्चतम स्तर है। गोपियों का प्रेम ‘हारिल पक्षी’ की तरह एकनिष्ठ था, जो विरह में भी कृष्ण का स्मरण करती थीं।
उन्होंने कहा कि रास लीला भौतिक न होकर दिव्य थी जहा देह का भेद समाप्त हो जाता है और केवल आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है।भक्ति योग ईश्वर के प्रति निस्वार्थ प्रेम, पूर्ण समर्पण और अटूट श्रद्धा का मार्ग है, जिसे भगवद गीता में सर्वोच्च और सरलतम योग माना गया है। यह मन को भगवान के चरणों में समर्पित कर नाम स्मरण, कीर्तन और लीला श्रवण के माध्यम से ईश्वर से प्रेमपूर्ण संबंध जोड़ता है, जिसमें समर्पण ही सार है।
