
धामी कैबिनेट में पुत्र सौरभ के अलावा चार अन्य मंत्री बेहद करीबी

एक दशक पहले कांग्रेस के नौ विधायकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए थे बहुगुणा
हरीश जोशी/पहाड़ का सच देहरादून। राजनीतिक गुणा भाग चाहे कुछ भी हों और उसका फलक कहां तक हो,ये अलग बात है, लेकिन एक सच आईने की तरफ साफ है कि भाजपा “उधार” उतारने में कोई कंजूसी नहीं छोड़ती। पूर्व सीएम विजय बहुगुणा को ही ले लीजिए,निरपराध सीएम की कुर्सी छीन जाने के बाद कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने वाले विजय बहुगुणा के कई करीबियों को धामी कैबिनेट में शामिल किया गया है।
उत्तराखंड में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के बीच राजनीतिक अदावत की कहानी नई नहीं है। ये नारायण दत्त तिवारी और हरीश रावत के युवा काल से चली आ रही है।साल 2002 में जब तिवारी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने तो तिवारी के पाले में दो नए किरदार विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज जुड़ गए। आम चर्चा रही कि उस समय हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाए जाने का इन दोनों नेताओं ने प्रबल विरोध किया। आगे उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में इन तीनों नेताओं के इर्द गिर्द जो भी घटित हुआ, उनमें पुरानी चली आ रही राजनीतिक अदावत का ही कुछ न कुछ असर जरूर महसूस किया जाता रहा है।

साल 2013 में केदारनाथ आपदा के बाद विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत से डॉक्टर हरक सिंह रावत व बहुगुणा गुट के कुछ करीबी विधायकों के बीच उपजे गहरे मतभेदों के कारण दो साल तक शांत रहे पूर्व सीएम विजय बहुगुणा कांग्रेस के नौ विधायकों हरक सिंह रावत, सुबोध उनियाल, उमेश शर्मा काऊ, कुंवर प्रणव सिंह, श्रीमती अमृता रावत, शैलेन्द्र मोहन सिंघल, श्रीमती शैला रानी रावत व प्रदीप बत्रा सहित भाजपा में शामिल हो गए।
इस बीच राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगा तथा विधानसभा अध्यक्ष ने सभी नौ विधायकों की सदस्यता भी समाप्त कर दी। कोर्ट के हस्तक्षेप से हरीश रावत सरकार बहाल हुई। बताया जाता है कि उस समय भाजपा में शामिल होने की दशा में बहुगुणा ने भाजपा हाईकमान से ये आश्वासन ले लिया था कि कांग्रेस से भाजपा में आए सभी नौ सदस्यों को 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी अपने टिकट पर चुनाव लड़ाएगी और भाजपा ने अपना वादा पूरा किया।
बहुगुणा के चुनाव न लड़ने के फैसले को देखते हुए उनके पुत्र सौरभ बहुगुणा की सितारगंज से चुनाव लड़ाया गया जबकि पूर्व मंत्री अमृता रावत की सीट से उनके पति सतपाल महाराज ने चुनाव लड़ा। भाजपा से कांग्रेस में गए सभी पूर्व विधायक चुनाव जीते। राजनीतिक चर्चाओं में अक्सर ये बात कही जाती है कि कांग्रेस के नौ विधायकों की अपने ही तत्कालीन सीएम से अदावत से जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ उससे भाजपा के सामने कांग्रेस कमजोर हो गई। भाजपा 2017 से लगातार उत्तराखंड में सत्ता में है।
हाल ही में धामी कैबिनेट में विस्तार के बाद जो तस्वीर सामने आई है उसमें तीन काबिना मंत्री हरिद्वार से प्रदीप बत्रा, नैनीताल से राम सिंह कैड़ा व रुद्रप्रयाग से भरत सिंह चौधरी, पूर्व सीएम बहुगुणा के करीबियों में गिने जाते हैं जबकि मंत्री सुबोध उनियाल व बहुगुणा के पुत्र सौरभ बहुगुणा पहले से ही धामी कैबिनेट में हैं। सुबोध उनियाल व भरत सिंह चौधरी ,विजय बहुगुणा के पिता हेमवती नंदन बहुगुणा के प्रबल समर्थकों में गिने जाते हैं।
