
कांग्रेस ने बजट सत्र के दौरान सदन में भी घेरा,महाराज ने दी सफाई,उनका मंतव्य ये नहीं था

पीसीसी अध्यक्ष गोदियाल के बाद नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य व प्रीतम ने महाराज के बयान को जोड़कर सरकार की मंशा पर उठाये सवाल
पहाड़ का सच गैरसैंण। अधूरा होमवर्क या श्रेय लेने की होड़, वजह जो भी हो, हैवीवेट कहलाने वाले कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज सदन में हों सदन से बाहर सवालों के घेरे में उलझ ही जाते हैं। गैरसैंण विस भवन के उपयोग के बारे में सुझाए गए उनके प्लान की हालत देखिए, चारों तरफ उनके ” महत्वाकांक्षी” प्लान की किरकिरी हो रही है। हैरत की बात यह है कि सत्ता प्रतिष्ठान हो या भाजपा, किसी भी व्यक्ति ने महाराज के प्लान के समर्थन में एक शब्द भी नहीं बोला।

विधानसभा सदन में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह ने कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज व सरकार पर निशाना साधा। प्रीतम ने कहा कि सरकार में विरोधाभाष दिख रहा है। पर्यटन मंत्री के बयान से ये लगता है कि सरकार विस भवन का उपयोग वेडिंग डेस्टिनेशन, कार्पोरेट अथवा टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप मे क्या करना चाहती है। यह ग्रीष्मकालीन राजधानी है और सदन के बाहर ऐसी घोषणा होने पर सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
उक्रांद ने भी वैडिंग डेस्टिनेशन के मुद्दे पर सरकार को घेरा है। दल की केंद्रीय उपाध्यक्ष मीनाक्षी घिल्डियाल ने कहा कि यह न केवल मंत्री बल्कि सरकार की सोच का प्रतीक है। इससे लगता है कि भाजपा गैरसैंण को स्थाई राजधानी नहीं बनाना चाहती है। पहाड़ी पार्टी के महासचिव मोहन सिंह नेगी ने भी महाराज के प्लान संबंधी बयान की तीखी आलोचना की है।
गौरतलब है कि मंगलवार को कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमे उन्होंने पर्यटन विकास के लिए गैरसैंण विधान सभा को वेडिंग डेस्टिनेशन सहित अन्य उपयोग की बात कही थी। इसे लेकर कांग्रेस ने विरोध जताया और कहा कि गैरसैंण जन भावनाओं का प्रतीक है। कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने भी इसे भाजपा की सोच बताया।
महाराज को सलाहकारों का सहयोग लेना चाहिए
बताते चलें कि कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज के राजधानी देहरादून में निजी आवास को मिलाकर तीन ऑफिस हैं। सलाहकारों की बड़ी फौज है। इनमें कई सरकारी अधिकारी भी हैं जो कई मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों के साथ काम कर चुके हैं जबकि कुछ ऐसे भी हैं जो पूर्व मुख्यमंत्रियों के ओएसडी भी रह चुके है । यहां विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्रित्वकाल की एक बात का जिक्र कर रहा हूं। सीएम सचिवालय के एक बड़े आईएएस अधिकारी को सीएम ने जिम्मा दिया कि एक व्यक्ति (जो अब माननीय है) पर लगे मुकदमे सरकार हटाना चाहती है, लिहाजा फाइल तैयार करो। उस अधिकारी ने सभी मुकदमों की गहराई से छानबीन के बाद ये पाया कि संगीन धाराओं में लगे मामलों को सरकार वापस लेती है तो सरकार/मुख्यमंत्री की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
अफसर ने मुख्यमंत्री से वस्तु स्थिति बताई और सीएम समझ गए। मुकदमे वापस नहीं हुए। जानकारी है कि वे मुकदमे आज भी चल रहे हैं। कहने का मकसद ये है कि सलाहकार कम हों लेकिन ” बीरबल ” जैसे हों जो भले बुरे की समझ रखते हों और अपने आका को वक्त रहते आईना दिखाने की हिम्मत भी रखते हों।निश्चित तौर पर कहा जाता है कि महाराज निष्पक्ष और नियमानुसार काम करने वाले हैं किन्तु मातहतों को कौन दुरुस्त करे। एक फाइल में डिजिटल साइन का मामला जगजाहिर है। उसमें भी बड़ी किरकिरी हुई।
