
पहाड़ का सच जानिए पांच मार्च के बारे में: 1770 का बोस्टन में नरसंहार, 1946 में है चर्चिल का ‘आयरन कर्टन’ भाषण, और 1953 में जोसेफ स्टालिन का निधन शामिल हैं।
भारत में, 1931 में गांधी-इरविन समझौता, 1997 में इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन की स्थापना, और 2010 में इसरो का भारी रॉकेट परीक्षण (सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र) महत्वपूर्ण हैं।
प्रमुख घटनाएं (इतिहास के पन्नों से)
1770: बोस्टन नरसंहार (Boston Massacre), जिसने अमेरिकी क्रांति की नींव रखी.
1931: महात्मा गांधी ने वायसराय लॉर्ड इरविन के साथ ऐतिहासिक संधि के बाद सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित किया.
1946: विंस्टन चर्चिल ने प्रसिद्ध “आयरन कर्टन” (Iron Curtain) भाषण दिया.
1953: सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन का निधन.
1966: जापान के माउंट फूजी में BOAC बोइंग 707 विमान दुर्घटना में 124 लोगों की मृत्यु.
1983: बाब हाक ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री बने.
1997: भारत सहित 14 देशों ने मिलकर ‘इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन’ (IOR-ARC) का गठन किया.
2010: इसरो (ISRO) द्वारा आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से उन्नत ‘साउंडिंग रॉकेट’ का सफल परीक्षण.
2018: ऑस्कर अवार्ड्स में ‘द शेप ऑफ वाटर’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला.
5 मार्च को जन्मी प्रसिद्ध हस्तियां:
1913: गंगूबाई हंगल, भारतीय शास्त्रीय गायिका.
1916: बीजू पटनायक, भारतीय राजनीतिज्ञ.
गांधी इरविन समझौता : कारण, परिणाम …
गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931) महात्मा गांधी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच हुआ एक प्रमुख राजनीतिक समझौता था, जिसे ‘दिल्ली पैक्ट’ भी कहते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य सविनय अवज्ञा आंदोलन को रोकना और कांग्रेस को दूसरे गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के लिए मनाना था, जिसके तहत सविनय अवज्ञा को स्थगित किया गया और कैदियों की रिहाई पर सहमति बनी।
समझौते की मुख्य बातें (1931): आंदोलन की वापसी: कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन बंद करने और दूसरे गोलमेज सम्मेलन (London) में भाग लेने पर सहमत हुई।
नागरिकों को अधिकार: सरकार ने तटीय निवासियों को नमक बनाने की अनुमति दी और शराब/विदेशी कपड़ों की दुकानों के सामने धरना देने की छूट दी।
राजनीतिक कैदी: हिंसा के आरोपी न होने वाले सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा किया गया।
जब्त संपत्ति: आंदोलन के दौरान जब्त की गई संपत्ति को वापस किया गया।
परिणाम और महत्व: यह समझौता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक ‘युद्धविराम’ के रूप में देखा गया, जिसने ब्रिटिश शासन को पहली बार कांग्रेस के साथ बराबरी का दर्जा देते हुए बातचीत करने पर मजबूर किया। हालांकि इस समझौते में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी को रोकने की शर्त न मानी जाने के कारण इसका कांग्रेस के भीतर ही कड़ा विरोध भी हुआ था।

