
पहाड़ का सच/एजेंसी।

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत, शुक्रवार को भोपाल में आयोजित ‘प्रमुख जन गोष्ठी’ में शामिल हुए। उन्होंने कहा हमारे मत-पंथ, सम्प्रदाय, भाषा, जाति अलग हो सकती है, लेकिन हिन्दू पहचान हम सबको जोड़ती है। हम सबकी एक संस्कृति और धर्म है। हम सबके पूर्वज समान हैं। मंच पर मध्यभारत प्रान्त के संघचालक अशोक पांडेय और भोपाल विभाग के संघचालक सोमकान्त उमालकर उपस्थित रहे।
हिंदुस्तान में चार प्रकार के हिन्दू
डॉ. भागवत ने कहा कि हिंदुस्तान में चार प्रकार के हिन्दू रहते हैं- एक, जो कहते हैं कि गर्व से कहो हम हिन्दू है। दो, जो कहते हैं कि गर्व की क्या बात है, हम हिन्दू हैं। तीन, जो कहते हैं कि जोर से नहीं बोलो, आप घर में आकर देखो, हम हिन्दू ही हैं। चार, जो भूल गए हैं कि हम हिन्दू हैं। उन्होंने कहा, “जब-जब हम यह भूल जाते हैं कि हम हिन्दू हैं तो विपत्ति आती है। भारत का इतिहास देख लीजिए। इसलिए हिन्दू को जगाना और संगठित करना आवश्यक है। हमें समझना होगा कि हिन्दू धार्मिक पहचान से बढ़कर, स्वभाव और प्रकृति है।”
आपस में सद्भावना रखकर सब लोग चलें, इसके लिए जो संयम चाहिए, वह धर्म है
धर्म को परिभाषित करते हुए डॉ. भागवत ने कहा, “धर्म का अर्थ रिलीजन नहीं है। धर्म का अर्थ पूजा-पद्धति नहीं है। धर्म सबको साथ लेकर चलता है। सबका उत्थान करता है। धर्म सबके लिए आनंददायक है। स्वभाव धर्म है। कर्तव्य धर्म है। आपस में सद्भावना रखकर सब लोग चलें, इसके लिए जो संयम चाहिए, वह धर्म है।” उन्होंने कहा कि रुचि-प्रकृति के भेद के अनुसार रास्ते अनेक हैं लेकिन हम सबको जाना एक ही जगह हैं। मनुष्य प्रकृति अनुसार अपने मार्ग का चुनाव करता है।
संघ दुनिया का अनूठा संगठन
संघ दुनिया में अनूठा संगठन है। इसलिए संघ को किसी से तुलना करके नहीं समझा जा सकता। संघ गणवेश पहनकर पथ संचलन करता है तो यह पैरा मिलिट्री फोर्स नहीं है। सेवा कार्य चलाता है, उन्हें देखकर यह नहीं मानना चाहिए कि संघ समाजसेवी संगठन है। संघ को लेकर संघ हितैषी और संघ विरोधी, दोनों ने ही कई ऐसी बातें समाज में चलाई हैं, जो संघ नहीं है। इसलिए शताब्दी वर्ष पर विचार बनाया कि समाज के सामने संघ की सही जानकारी जानी चाहिए।
संघ का मकसद समाज को जोड़ना है
सरसंघचालक डॉ. भागवत का कहना यह भी रहा कि संघ किसी की प्रतिक्रिया में शुरू हुआ संगठन नहीं है। संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा भी नहीं है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने देश-समाज के हित में चलने वाले सभी प्रकार के कार्यों में सहभागिता की। स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लिया। यह सब काम करते हुए वे चिंतन-मंथन करते थे। बालगंगाधर तिलक, वीर सावरकर, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय और डॉ. भीमराव अंबेडकर सहित उस समय के कई महापुरुषों के साथ देश की परिस्थितियों को लेकर उनकी चर्चा हुई है। उनको ध्यान आया कि बाहर से आने वाले मुट्ठीभर लोग, जो हमसे कमतर हैं, इसके बाद भी हमको, हमारे घर मे आकर ही पराजित कर देते हैं।
संघ ने बहुत विरोध सहा
इसके साथ ही सरसंघचालक डॉ. भागवत का कहना था, “उपेक्षा के बावजूद संघ के कार्यकर्ता निराश नहीं हुए। उपेक्षा और विरोध के बाद भी भारत माता के प्रति आस्था रखते हुए आगे बढ़ते रहे। दुनिया का ऐसा कोई संगठन नहीं है, जिसने इतना विरोध सहा हो, जितना संघ ने सहा है। विपरीत परिस्थितियों में अपना सबकुछ दांव पर लगाकर कार्यकर्ताओं से संघ का कार्य किया है। सब प्रकार का अभाव और विरोध सहकर स्वयंसेवकों ने संघ को आज यहां तक पहुंचाया है, जहां अब सब संघ पर विश्वास करते हैं। सम्पूर्ण समाज का संगठन करना है, अभी यह कार्य बाकी है।”
